मध्यप्रदेश के पचमढ़ी में 3 जून को आयोजित होने जा रही कैबिनेट बैठक केवल प्रशासनिक दृष्टि से नहीं, बल्कि राज्य की ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल है। इस बैठक को सतपुड़ा की वीरता, स्वाभिमान और जनजातीय नायकों की स्मृति को समर्पित किया गया है।
बैठक के केंद्र में रहेंगे राजा भभूत सिंह—हर्राकोट के जागीरदार और स्वतंत्रता संग्राम के एक गुमनाम लेकिन महान योद्धा। उन्होंने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ जनजातीय समाज को संगठित किया, बल्कि सतपुड़ा के घने जंगलों और पहाड़ी मार्गों का रणनीतिक उपयोग कर गुरिल्ला युद्ध में ब्रिटिश सेना को बार-बार परास्त किया। उनके पास पहाड़ों के चप्पे-चप्पे की जानकारी थी, और यही उनका सबसे बड़ा सामरिक हथियार बना।
इतिहासकारों के अनुसार, राजा भभूत सिंह ने तात्या टोपे के साथ मिलकर नर्मदा क्षेत्र में आज़ादी की रणनीति बनाई और 1858 में अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंकते हुए नर्मदा पार की। अंग्रेजी सेना के मद्रास इन्फेंट्री तक को भेजना पड़ा था उन्हें पकड़ने के लिए, लेकिन वे 1860 तक लगातार संघर्ष करते रहे। उनका रणकौशल शिवाजी महाराज के गुरिल्ला युद्ध की याद दिलाता है।
राजा भभूत सिंह की यह गाथा न केवल सतपुड़ा की वीरता की मिसाल है, बल्कि यह देश के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज की भूमिका को भी प्रमुखता से उजागर करती है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल से अब यह इतिहास फिर से जन-जन तक पहुंचेगा।
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