विश्लेषण : जहाँ पीड़िता से संयम और अपराधी से समझौते की उम्मीद रखी गई !!
यह प्रश्न केवल आस्था का नहीं है,
यह न्याय, नैतिकता और सामाजिक प्रशिक्षण का प्रश्न है।
सीता का अपहरण और महीनों की बंदी
रामायण की केंद्रीय घटना है।
फिर भी एक असहज प्रश्न सदियों से दबा दिया गया:
सीता के अपहरण और अपमान के बावजूद
रावण को ‘अवसर’ देने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
‘अवसर’ का तर्क — और उसकी कीमत
दूत भेजा गया।
संदेश गया — “सीता लौटा दो, युद्ध टल सकता है।”
यह राजधर्म की भाषा थी।
लेकिन नारी-न्याय की दृष्टि से यह भाषा असहज है।
क्योंकि यदि रावण मान जाता तो क्या होता?
• युद्ध नहीं होता
• रावण जीवित रहता
• सीता लौटा दी जाती
लेकिन सवाल यह है:
सीता के अपमान का क्या?
उनके भय, कैद, मानसिक पीड़ा का क्या?
उस अपराध का दंड कहाँ तय होता?
यहाँ न्याय अपराध के बाद नहीं,
बल्कि राजनीतिक समझौते पर निर्भर दिखता है।
यही वह बीज है
जहाँ से “अंततः न्याय होगा” वाली मानसिकता पैदा हुई।
तुलना असहज है, पर ज़रूरी है
अब उसी कथा में एक और प्रसंग है।
रावण की बहन शूर्पणखा —
उसके नाक-कान दो पुरुषों की मौजूदगी में काटे गए।
सही या गलत — वह अलग बहस है
लेकिन यहाँ प्रतिक्रिया तत्काल थी
- शूर्पणखा एक नारी थी – लेकिन उसे तत्काल दंडित किया गया !
• कोई दूत नहीं
• कोई राजनीतिक संदेश नहीं
• कोई अवसर नहीं
यहीं प्रश्न खड़ा होता है:
जब एक पुरुष यानि रावण ने जब एक नारी यानि सीता माता का अपहरण और अपमान किया तो उसे तत्काल दंडित क्यों नहीं किया गया ?? क्यों नहीं ब्रह्मास्त्र चलाया गया ?? क्यों अंगद को भेजकर अपराधी को ‘ अवसर ‘ दिया गया ??
कि अगर वो सीता को लौटा दें तो ना युद्ध होगा और ना वो मारा जायेगा !! ?
और अगर रावण ये ‘ अवसर ‘ का लाभ ले लेता और मान जाता .. तो .?? सीता एक नारी के अपमान का क्या ये न्याय होता ?
यह प्रश्न किसी पात्र को महान या खलनायक घोषित करने के लिए नहीं,
बल्कि नारी-न्याय की प्राथमिकता समझने के लिए है।
सीता माता का बंदीगृह— अशोक वाटिका। एक और अनकहा तथ्य
यह भी तथ्य है कि:
• सीता माता को किसी अंधे कारागार में नहीं रखा गया
• उन्हें अशोक वाटिका में, महिला प्रहरियों के साथ रखा गया
इसका उद्देश्य था:
सीता जी पर कोई नैतिक आक्षेप न लगे।
विडंबना देखिए—
• लंका में रहते हुए सीता की मर्यादा पर कोई प्रश्न नहीं उठा
• लेकिन अयोध्या में, रामराज्य में
उन पर प्रश्न उठे
और परिणाम?
• राजमहल त्याग
• वनवास
• लेकिन इस बार राम साथ नहीं गए
यानी:
जिस स्त्री ने बिना अपराध वनवास स्वीकार किया,
उसी स्त्री को अंततः अकेला छोड़ दिया गया।
“लक्ष्मण रेखा” — दोष कहाँ रखा गया?
अपहरण के बाद कहा गया:
“लक्ष्मण रेखा क्यों लांघी?”
यह नहीं कहा गया कि:
• कथित सुरक्षा तंत्र विफल हुआ
• दो सशस्त्र पुरुषों की उपस्थिति के बावजूद अपहरण हुआ
दोष व्यवस्था पर नहीं,
स्त्री के आचरण पर डाला गया।
यह वही मानसिकता है जो आज भी कहती है:
• देर रात बाहर क्यों थी
• अकेली क्यों गई
• कपड़े कैसे थे
अर्थात:
घर से बाहर मत निकलो — यही सुरक्षा है।
यहीं से आज की न्याय-संस्कृति जन्म लेती है
आज जब अपराध होता है:
• अपराधी को अवसर मिलते हैं
• ज़मानत
• पैरोल
• तकनीकी खामियाँ
• पीड़िता से कहा जाता है:
• सब्र रखो
• प्रक्रिया पूरी होने दो
यह कोई अचानक बनी व्यवस्था नहीं है।
यह उस परंपरा की निरंतरता है जहाँ:
• नारी का अपमान गंभीर तो माना गया
• लेकिन उसका दंड तत्काल और अनिवार्य नहीं बनाया गया
निष्कर्ष — जो कड़वा है, पर ज़रूरी है
आज हम जिस न्याय-व्यवस्था से त्रस्त हैं,
उसका पूरा दोष वर्तमान पर डाल देना आसान है।
लेकिन सच यह है:
हमने जिन आदर्शों को बिना प्रश्न स्वीकार किया,
उन्हीं से यह सोच बनी कि
अपराधी को अवसर मिल सकता है
और पीड़िता को प्रतीक्षा करनी चाहिए।
समर्थ होते हुए भी सनातन समाज ने
प्रतिकार के बजाय प्रतीक्षा चुनी —
सरकार की, व्यवस्था की, अवतार की।
न्याय तब तेज़ नहीं होगा
जब अगला अवतार आएगा।
न्याय तब तेज़ होगा
जब समाज यह तय करेगा कि:
नारी का अपमान कोई ऐसा अपराध नहीं
जिस पर ‘अवसर’ दिया जाए।
आज जो कश्मीर में हुआ – बंगाल और बांग्लादेश में हो रहा है – और भी अलग अलग स्थानों में – नारी यहाँ तक छोटी बच्चियों के साथ जो बलात्कार और अत्याचार किये जा रहे है – उसे सालों साल बाद भी क्या रोका जा सका ? क्या अपराधियों को त्वरित दंड देने वाली न्याय व्यवस्था क्या है ??
पीड़ित को खुद न्याय के लिये भटकना पड़ता है और अपराधी आराम से व्यवस्था का मखौल उड़ाता है । सजा सालों बाद मिल भी गई तो ज़मानत और पे रोल के अवसर !!
नारी की पीड़ा ये देख और कराह उठती है ।
जरा सोचे
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