हमीरपुर जनपद की राठ तहसील से एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है, जहाँ पर्यावरण संरक्षण के सरकारी दावे पूरी तरह धराशायी होते नजर आ रहे हैं। राठ तहसील स्थित मंगरौठ मंडी परिसर में बिना अनुमति, बिना नीलामी और बिना किसी वैधानिक आदेश के हरे-भरे पेड़ों का खुलेआम कटान किए जाने का आरोप लगा है।

ग्रामीणों के मुताबिक, यह अवैध कटान करीब 50 हजार रुपये की कथित सौदेबाज़ी के बाद किया गया, जिसमें मंडी सचिव और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप है कि सरकारी संपत्ति की कीमती लकड़ी को नियमों को ताक पर रखकर चोरी-छिपे बेच दिया गया।

तीन दिनों तक चला अवैध कटान, कोई रोक-टोक नहीं

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पिछले तीन दिनों से मंडी परिसर में लगातार हरे पेड़ों की कटाई की जा रही थी।
ना तो वन विभाग की अनुमति ली गई,
ना कोई लिखित आदेश मौजूद था,
और ना ही मंडी नियमों के अनुसार नीलामी की प्रक्रिया अपनाई गई।

इसके बावजूद लाखों रुपये की कीमत वाली लकड़ी को बाहर निकाल दिया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि मंडी सचिव की जानकारी और संरक्षण के बिना इतनी बड़ी अवैध कार्रवाई संभव ही नहीं है।

50 हजार में सौदा, लकड़ी की कीमत लाखों में!

ग्रामीणों का दावा है कि पेड़ों के कटान के बदले सिर्फ 50 हजार रुपये में सौदा तय किया गया, जबकि काटी गई लकड़ी की वास्तविक कीमत लाखों रुपये बताई जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि—

सरकारी लकड़ी किसके इशारे पर बेची गई और उससे मिले पैसे आखिर गए कहाँ?

मामला उजागर होने के बाद जब सवाल उठे तो मंडी सचिव राजेश कुमार वर्मा ने खुद को इससे अनजान बताते हुए किसी भी प्रकार की जानकारी से इनकार कर दिया।

वहीं, राठ एसडीएम ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा है कि पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज कर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

अब बड़ा सवाल— कार्रवाई होगी या दब जाएगा ‘हरा घोटाला’?

फिलहाल पूरे मामले में प्रशासन के आश्वासन के बाद भी कई सवाल खड़े हैं।
क्या इस ‘हरे घोटाले’ के असली जिम्मेदारों तक जांच पहुँचेगी?
या फिर पर्यावरण की यह हत्या भी फाइलों में दबकर रह जाएगी?

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