कलियुग से पहले द्वापर के अंतिम चरण में महाभारत के महायुद्ध में पूरा विश्व दो खेमों में बँटा था – कौरव और पांडव । लेकिन ये दोनो ही पक्ष एक ही धर्म के थे यानि सनातन ।
तो फिर कलियुग में कैसे इतने गैर सनातनी पंथ बन गये – विशेष तौर पर यहूदी, ईसाई और इस्लाम – चूँकि ईसाई और इस्लाम इस समय विश्व के दो सबसे बड़े पंथ है ।
तो इस लेख के माध्यम से बिना किसी की आस्था को ठेस पहुँचाये तथ्यों के आधार पर जानते हैं कि आखिर इन पंथों की शुरुआत कैसे हुई जबकि इन सबकी जड़ों में सनातन ही ही !! ?
कौन थे हज़रत अब्राहम ?
- हज़रत अब्राहम (लगभग 2000 ई.पू.) मध्य एशिया–मेसोपोटामिया क्षेत्र (वर्तमान इराक–ईरान–तुर्की सीमा) के निवासी थे।
- यहूदी, ईसाई और इस्लाम – तीनों उन्हें “पितृ पुरुष” (Patriarch) मानते हैं।
- लेकिन उनकी परिवारिक जड़ें सनातनी परंपराओं से जुड़ी थीं, जहाँ देवताओं और मूर्तियों की पूजा होती थी।
अब्राहम का परिवार वृक्ष (Family Tree)
बाइबिल (Old Testament), इस्लामी ग्रंथ (कुरान और तफ़्सीर), और ऐतिहासिक लेखों के आधार पर अब्राहम का वंश इस प्रकार मिलता है:
- नूह (Noah / नूह)
महाप्रलय के बाद पुनः मानव वंश की शुरुआत। - शेम (Shem / शेम)
नूह के पुत्र, जिनसे सेमेटिक जातियाँ बनीं। - अर्पक्षद (Arpachshad / अर्फ़ख़शद)
- शेलह (Shelah / शालह)
- एबर (Eber / एबर) – जिनसे “हिब्रू / Hebrew” शब्द निकला।
- पेलग (Peleg / पेलग)
- रियू (Reu / रेऊ)
- सेरुग (Serug / सरुग)
- नाहोर (Nahor / नाहोर)
- तरेह / आज़र (Terah / Azar / तारख़)
- अब्राहम के पिता।
- मूर्तिपूजक व्यापारी, जो देवताओं की मूर्तियाँ बनाते और बेचते थे।
तरेह के तीन पुत्र:
- अब्राम / इब्राहीम (Abraham / Ibrahim)
- नाहोर
- हारान (जिनका पुत्र लूत बाद में पैग़ंबर माने गए)।
तरेह और पूर्वज – मूर्तिपूजक परंपरा
- तरेह और उनका वंश बहुदेववादी प्रणाली का पालन करता था।
- मेसोपोटामिया (उर, बाबिलोन, हर्रान) में उस समय चंद्रदेव “सिन” (Sin / Nanna) और अन्य देवताओं की पूजा होती थी।
- देवताओं की मूर्तियाँ घर–घर में होती थीं, जिन्हें तरेह और उनके जैसे व्यापारी बनाकर बेचते थे।
- यह परंपरा सनातन धर्म की बहुदेववादी और मूर्ति-पूजक धारा से मेल खाती है, जहाँ देवताओं के अनेक स्वरूप स्वीकार किए जाते हैं।
अब्राहम का विद्रोह – मूर्तिपूजा से एकेश्वरवाद तक
- अब्राहम ने अपने पिता की मूर्तियों को तोड़ा और कहा –
“ये पत्थर तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते, केवल एक अदृश्य, निराकार ईश्वर ही परम सत्य है।” - यही क्षण था जब उन्होंने मूर्ति–पूजा का विरोध कर “एकेश्वरवाद” (Monotheism) का बीजारोपण किया।
- बाद में यह विचार यहूदी धर्म, फिर ईसाई धर्म और फिर इस्लाम की नींव बना।
नई धारा से बना संघर्ष :
अब्राहम ने सनातनी बहुदेववाद को तोड़कर “एक ईश्वर – एक किताब – एक पैग़ंबर” की परंपरा शुरू की।
इससे तीन अब्राहमिक पंथ निकले:
- यहूदी धर्म (Judaism) – अब्राहम के पुत्र इसहाक और पोते याकूब से।
- ईसाई धर्म (Christianity) – यीशु मसीह को अब्राहमिक वंश का “मसीहा” मानकर।
- इस्लाम (Islam) – अब्राहम के पुत्र इस्माइल की वंशावली से, जहाँ पैगंबर मुहम्मद आए।
श्रेष्ठता की दौड़ और टकराव
- जब तीनों ही धर्म “अब्राहम को अपना मूल” मानते हैं, तो उनमें श्रेष्ठता का संघर्ष शुरू हुआ।
- यहूदियों ने कहा – “हम चुने हुए लोग हैं।”
- ईसाईयों ने कहा – “मोक्ष केवल यीशु के द्वारा है।”
- मुसलमानों ने कहा – “अल्लाह का आख़िरी संदेश सिर्फ़ इस्लाम है।”
परिणाम:
- क्रूसेड युद्ध (ईसाई बनाम मुस्लिम)।
- यहूदियों पर अत्याचार (रोम से लेकर होलोकॉस्ट तक)।
- आज भी इस्राइल–फलस्तीन, ईसाई–इस्लामी टकराव, और आतंकवाद की जड़ यही है।
निष्कर्ष :
- अब्राहम पंथो की जड़ें सनातनी–मूर्ति-पूजक परंपरा से थीं।
- उनका विद्रोह एक नए विचार (Monotheism) को जन्म देता है।
- यही विचार यहूदी–ईसाई–इस्लाम तीन धाराओं में बंटता है।
- लेकिन मूर्तिपूजा का विरोध और “केवल मेरा ईश्वर ही सत्य है” की मान्यता आगे चलकर युद्ध, आतंक और नरसंहार का कारण बना।
मुख्य बिंदु (संक्षेप में)
- अब्राहम के पिता तरेह मूर्तिकार और मूर्तिपूजक।
- पूरा परिवार मूल रूप से बहुदेववादी सनातनी परंपरा से जुड़ा।
- अब्राहम ने इसे तोड़कर “एकेश्वरवाद” का प्रचार किया।
- इससे यहूदी–ईसाई–इस्लाम धर्म बने।
- “पंथ श्रेष्ठता की दौड़” की वजह से आज तक दुनिया में युद्ध और खूनखराबा चल रहा है ।
