पब्लिक फर्स्ट । सत्य दर्शन । आशुतोष ।
(भविष्यपुराण, प्रतिसर्ग पर्व, आदम–हव्यवती प्रसंग और अवतार वाद पर विमर्श )
DISCLAIMER: विनम्र आग्रह :
यह लेख धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन व वैचारिक विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी समुदाय, धर्म या व्यक्ति को ठेस पहुँचाना नहीं है।
मूल प्रश्न: सत्य बनाम “ अवतार व्यवस्था”
सवाल यह नहीं है कि कौन-सा पंथ सही है।
सवाल यह है कि:
क्या किसी दर्शन को यह अधिकार है कि वह
वर्तमान अन्याय को “युग-धर्म” कहकर वैध ठहराए और न्याय को भविष्य (कल्कि) में टाल दे?
इसी कसौटी पर अवतार-वाद को परखा जाना चाहिए।
भविष्यपुराण (प्रतिसर्ग पर्व): कलि-विस्तार की कथा
(क) कलि–विष्णु संवाद (श्लोक)
बहुरूपमहं कृत्वा तवेच्छां पूरयाम्यहम् ।
आदमो नाम पुरुषः पत्नी हव्यवती तथा ।
विष्णुकर्दमतो जातौ म्लेच्छवंशप्रवर्धनौ ॥
शाब्दिक अर्थ
“मैं अनेक रूप धारण कर तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा।
‘आदम’ नाम का पुरुष और ‘हव्यवती’ नाम की उसकी पत्नी—
ये दोनों म्लेच्छ वंश के प्रवर्धक होंगे।”
तथ्यात्मक बिंदु
• यहाँ कलि की इच्छा की पूर्ति का कथन है।
• “म्लेच्छवंशप्रवर्धनौ” — म्लेच्छ वंश का विस्तार—स्पष्ट शब्द हैं।
• अधर्म-निषेध/संहार का कोई आदेश नहीं।
पाठ के स्तर पर यह कलि-विस्तार की कथा है।
(ख) पाप-वृक्ष, सर्प, फल — बाइबिलिक संरचना
भविष्यपुराण में:
• पाप-वृक्ष
• सर्प-रूप
• निषिद्ध फल
यह Genesis (Garden/Fall) की कथा-संरचना से मेल खाता है।
(ग) नूह, नाव और प्रलय
भविष्यपुराण में:
• नूह को स्वप्नादेश
• नाव
• महाप्रलय
यह Noah’s Ark संरचना से मेल खाता है।
नाम और वंश: बाइबिल से साम्य (तथ्य)
निष्कर्ष (इस खंड का)
• भविष्यपुराण (प्रतिसर्ग पर्व) में
कलि को स्थान, संरचना और वंश मिलता दिखता है।
• इसे “ईश्वर-नीति” कहना कथा को नीति बना देना है।
• यही बिंदु अवतार-वाद को नैतिक संकट में डालता है।
अब कसौटी: अग्निलिंग की कथा (निर्णायक बिंदु)
अब प्रश्न आता है—
परम सत्य कौन है?
और कौन अभी निर्णय करता है, कौन टालता है?
अग्निलिंग की कथा: पहला द्वंद (श्लोक-सार)
पुराणों में वर्णित है कि:
• ब्रह्मा और विष्णु में विवाद हुआ—कौन श्रेष्ठ है
• तभी एक अनंत अग्निलिंग प्रकट हुआ
• ब्रह्मा ऊपर, विष्णु नीचे—दोनों अंत नहीं पा सके
निष्कर्ष:
जब ब्रह्मा (रचना) और विष्णु (पालन)—दोनों
परम सत्य को नहीं जान सके,
तो वे परम सत्य के स्वघोषित अधिकारी कैसे हो सकते हैं?
ब्रह्मा का असत्य और काल भैरव
कथा आगे कहती है:
• ब्रह्मा ने असत्य साक्ष्य दिया
• शिव के आदेश से काल भैरव ने ब्रह्मा के अहंकारी शीश को काटा
निर्णायक प्रश्न:
अगर यह “हत्या” है, तो आदेश किसका था?
और अगर आदेश शिव का था, तो दोष किसका?
काल भैरव को “ब्रह्महत्या” का दोष देना तर्क-विरोधी है, क्योंकि:
• वे न्याय-कर्त्ता हैं
• अहंकार का संहार हत्या नहीं होता
• असत्य का उच्छेदन पाप नहीं, धर्म है
वैष्णव प्रतिवाद और उसका संकट
यदि कोई कहे:
“अग्निलिंग की कथा शैव है, गलत है”
तो निष्कर्ष क्या निकलता है?
• काल भैरव भी नहीं
• शिव-आज्ञा भी नहीं
• ब्रह्मा का असत्य भी नहीं
तब पूरा पुराणिक न्याय-तंत्र ढह जाता है।
और यदि कथा सही है:
• तो काल भैरव सत्य हैं
• और वे पापी नहीं, बल्कि न्याय-स्वरूप हैं
निर्णायक अंतर: अभी बनाम बाद में
अब अंतिम कसौटी:
• जो अभी निर्णय करता है
• जो असत्य को उसी क्षण काटता है
• जो “भविष्य में देखेंगे” नहीं कहता
वही है शिव–शक्ति चेतना (काल भैरव)
और जो:
• निर्णय टालता है
• यहाँ भी होने का दावा करता है, वहाँ भी
• अधर्म को “युग-धर्म” कहकर स्वीकार करता है
वह कौन है—यह आप स्वयं सोचें।
विनम्र आग्रह :
1. भविष्यपुराण (प्रतिसर्ग पर्व) में
कलि-विस्तार की कथा है, संहार की नहीं
2. आदम–हव्यवती–नूह प्रसंग
बाइबिलिक कथा का पुराणिक पुनर्लेखन है
3. अवतार-वाद, जब न्याय को भविष्य में टालता है,
तो वह माया बन जाता है
4. अग्निलिंग बताता है—
जो परम सत्य को न जाने, वह परमेश्वर का दावा नहीं कर सकता
5. काल भैरव पापी नहीं—
वे अहंकार और असत्य के संहारक हैं
विनम्र निवेदन
जो दर्शन कहे—“अभी सहो, न्याय बाद में आएगा”
वह इंसानियत से दूर है।
जो चेतना कहे—“अभी असत्य काटो”
वही जीवित धर्म है।
यही शिव–शक्ति चेतना है।
जय श्री महाकाल – जय माँ महाकाली
जय जय श्री काल भैरव
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