कैलाश चन्द्र

संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें बच्चे केवल अपने माता-पिता के साथ नहीं, बल्कि भाई-बहनों, चचेरे-ममेरे भाई-बहनों, दादा-दादी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहते हुए जीवन जीना सीखते हैं। जब तीन-चार बच्चे एक साथ खेलते हैं, साथ बैठकर भोजन करते हैं, अपने खिलौने और वस्तुएँ बाँटते हैं, छोटे-बड़े का ध्यान रखते हैं और छोटी-छोटी बातों पर रूठते-मनाते हैं, तब उनके भीतर बिना किसी औपचारिक शिक्षा के सामाजिक जीवन के संस्कार विकसित होने लगते हैं। वे समझते हैं कि जीवन केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति का नाम नहीं, बल्कि दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने का भी नाम है। परिवार उन्हें सहयोग, सहिष्णुता, त्याग, धैर्य, अनुशासन, साझेदारी और परस्पर उत्तरदायित्व का व्यावहारिक प्रशिक्षण देता है।

इसी वातावरण में परस्पर स्नेह, आत्मीयता, अपनापन और एक-दूसरे का सहारा बनने की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है। मिलकर रहना, मिलकर काम करना, बाँटकर खाना और सुख-दुःख में साथ खड़ा रहना केवल नैतिक उपदेश नहीं रह जाते, बल्कि दैनिक जीवन का सहज व्यवहार बन जाते हैं। यही अनुभव आगे चलकर सामाजिक समरसता, सद्भाव, सह-अस्तित्व और राष्ट्रीय एकात्मता की आधारशिला बनते हैं। इस दृष्टि से परिवार वास्तव में समाज की पहली पाठशाला है, जहाँ अच्छे नागरिक ही नहीं, संवेदनशील और उत्तरदायी मनुष्य भी तैयार होते हैं।

भारत की सभ्यता को यदि कुछ शब्दों में समझाना हो तो कहा जा सकता है कि यह केवल भूगोल, राजसत्ता या अर्थव्यवस्था से निर्मित राष्ट्र नहीं है; यह परिवार, परंपरा, संस्कार और पीढ़ियों की निरंतरता से बनी हुई जीवन-व्यवस्था है। भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसका परिवार रहा है। यहाँ परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित इकाई नहीं, बल्कि वह संस्था है जिसमें जीवन के मूल्य, आचरण की मर्यादा, संबंधों का अनुशासन, कर्तव्य की भावना, त्याग की परंपरा और संस्कृति की धारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक प्रवाहित होती रही है। यही कारण है कि भारतीय परिवार व्यवस्था को केवल सामाजिक ढाँचा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवंत आधार माना गया है।

आज यह आधार एक गंभीर संक्रमण से गुजर रहा है। संयुक्त परिवारों का स्थान तेजी से एकल परिवार लेते जा रहे हैं। शहरीकरण, रोजगार, उपभोक्तावादी जीवन-दृष्टि, निजी स्वतंत्रता की बढ़ती आकांक्षा और बदलती जीवन-शैली ने परिवार की संरचना को बदल दिया है। यह परिवर्तन केवल रहने की व्यवस्था का परिवर्तन नहीं है; यह भारतीय समाज की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक निरंतरता और पीढ़ियों के बीच जीवित संवाद पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि संयुक्त परिवार बेहतर है या एकल परिवार, बल्कि यह है कि क्या भारत अपनी परिवार-केन्द्रित सांस्कृतिक शक्ति को खोता जा रहा है?

भारतीय परंपरा में संयुक्त परिवार केवल एक छत के नीचे रहने वाले लोगों का समूह नहीं था। वह जीवन की सामूहिक साधना थी। उसमें दादा-दादी का अनुभव, माता-पिता का परिश्रम, चाचा-चाची का सहयोग, भाई-बहनों का स्नेह और बच्चों की किलकारियाँ मिलकर एक ऐसा वातावरण निर्मित करते थे जिसमें व्यक्ति अकेला नहीं पड़ता था। जीवन की कठिनाइयाँ साझा होती थीं, सुख-दुःख का भार बँटता था, निर्णयों में अनुभव का संतुलन होता था और बच्चों को स्वाभाविक रूप से अनेक संबंधों के बीच जीना सीखने का अवसर मिलता था। संयुक्त परिवार व्यक्ति को यह सिखाता था कि जीवन केवल अधिकारों का नाम नहीं, बल्कि दायित्व, अनुशासन और सहअस्तित्व का भी नाम है।

इसके विपरीत एकल परिवार आधुनिक जीवन की अनिवार्यता के रूप में सामने आया। नौकरी, स्थानांतरण, महानगरीय जीवन, सीमित संसाधन और निजी जीवन की बढ़ती चाह ने इसे सामान्य बना दिया। यह स्वीकार करना होगा कि एकल परिवार के अपने कुछ व्यावहारिक लाभ हैं। उसमें निर्णय लेने की सुविधा होती है, निजता अधिक होती है, आर्थिक प्रबंधन सरल होता है और पारिवारिक हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम होता है। परंतु यही एकल परिवार जब भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से कट जाता है, तब वह सुविधा का ढाँचा तो बनता है, लेकिन संस्कार का केंद्र नहीं रह पाता। परिणामस्वरूप पति-पत्नी पर मानसिक और आर्थिक दबाव बढ़ता है, बच्चों का सामाजिक और भावनात्मक विकास सीमित होता है, और बुजुर्ग जीवन के सबसे संवेदनशील काल में अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करते हैं।

यहीं भारतीय परिवार व्यवस्था की सांस्कृतिक शक्ति का प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय परिवार की असली शक्ति उसकी संख्या या आकार में नहीं, बल्कि उसके संस्कार-तंत्र में रही है। यह परिवार ही था जिसने बच्चे को बोलना और चलना ही नहीं, बल्कि बड़ों का सम्मान करना, छोटे का संरक्षण करना, अतिथि का आदर करना, भोजन को प्रसाद की दृष्टि से देखना, पर्व-त्योहारों के माध्यम से सामूहिकता जीना, संकट में धैर्य रखना और व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर परिवार के हित को रखना सिखाया। भारत में विद्यालय ज्ञान दे सकता है, राज्य अधिकार दे सकता है, बाज़ार सुविधा दे सकता है; पर चरित्र, संवेदना और सांस्कृतिक आत्मा देने का कार्य मुख्यतः परिवार ही करता है।

भारतीय परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने पीढ़ियों के बीच संबंधों को केवल जैविक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक संबंध के रूप में देखा। दादा-दादी और नाना-नानी केवल घर के बुजुर्ग नहीं होते थे; वे परिवार की स्मृति, अनुभव, लोकज्ञान, धार्मिक आस्था और जीवन-व्यवहार के जीवंत स्रोत होते थे। माता-पिता वर्तमान के संघर्ष और उत्तरदायित्व के प्रतीक होते थे। बच्चे भविष्य की संभावना होते थे। जब ये तीनों पीढ़ियाँ एक सूत्र में बंधी रहती थीं, तब परिवार केवल निवास नहीं रहता था, वह एक जीवित परंपरा बन जाता था।

आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पीढ़ियों के बीच संवाद का तंतु टूट रहा है। बच्चे डिजिटल संसार में अधिक हैं, युवा पीढ़ी रोजगार और प्रतिस्पर्धा के दबाव में है, और बुजुर्ग अक्सर उस घर में भी अप्रासंगिक बना दिए जाते हैं जिसे उन्होंने खड़ा किया। परिवारों में साथ बैठने की परंपरा घट रही है, साझा भोजन दुर्लभ होता जा रहा है, घरों से कथा, संस्कार और पारिवारिक स्मृति का स्वर मंद पड़ रहा है। इसका परिणाम केवल इतना नहीं कि बुजुर्ग अकेले हो रहे हैं; इससे अगली पीढ़ी अपनी जड़ों, अपनी सांस्कृतिक स्मृति और अपने जीवन-मूल्यों से भी कटती जा रही है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि संयुक्त परिवार का अंध-रोमानीकरण भी उचित नहीं है। हर संयुक्त परिवार आदर्श नहीं था, और हर एकल परिवार विफल नहीं है। संयुक्त परिवारों में भी संपत्ति-विवाद, हस्तक्षेप, असमानता और तनाव रहे हैं। दूसरी ओर अनेक एकल परिवार ऐसे हैं जो अत्यंत सुसंस्कृत, संवेदनशील और पारिवारिक मूल्यों से समृद्ध हैं। इसलिए मूल प्रश्न परिवार की संरचना का नहीं, परिवार के आत्मतत्व रूपी भावना का है। यदि संयुक्त परिवार में प्रेम, सम्मान, दायित्व और संवाद नहीं है, तो वह केवल भीड़ है; और यदि एकल परिवार में भी बड़ों के प्रति आदर, रिश्तों के प्रति प्रतिबद्धता, बच्चों के प्रति संस्कार और विस्तृत परिवार से जीवंत जुड़ाव है, तो वह भारतीय परिवार की मूल चेतना को बचाए रख सकता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब पश्चिम से आयातित अतिव्यक्तिवादी दृष्टि परिवार को केवल सुविधा की व्यवस्था मानने लगती है। जब जीवन का केंद्र “हम” से हटकर केवल “मैं” हो जाता है, तब परिवार की जगह उपभोग ले लेता है, संबंधों की जगह उपयोगिता आ जाती है, और पीढ़ियों की निरंतरता की जगह तात्कालिक सुख को महत्व मिलने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ समाज धीरे-धीरे सांस्कृतिक रूप से निर्बल होने लगता है। जिस राष्ट्र के परिवार कमजोर होते हैं, वहाँ व्यक्ति अकेला, समाज असंबद्ध और संस्कृति असुरक्षित हो जाती है।

आज आवश्यकता संयुक्त परिवार और एकल परिवार की बहस में उलझने की नहीं, बल्कि भारतीय परिवार के मूल तत्वों को बचाने की है। परिवारों में संवाद लौटे, साझा समय लौटे, बुजुर्गों का सम्मान लौटे, बच्चों का संस्कार लौटे, और पीढ़ियों के बीच जीवंत संबंध फिर से स्थापित हों—यही भारतीय समाज की आवश्यकता है। यदि आधुनिक परिस्थितियाँ संयुक्त परिवार को कठिन बनाती हैं, तो भी एकल परिवारों को यह समझना होगा कि परिवार केवल आर्थिक इकाई नहीं है। उसे संस्कृति, स्मृति और मानवीय संबंधों का घर भी बने रहना होगा।

भारत की शक्ति केवल उसकी जनसंख्या, तकनीक या अर्थव्यवस्था में नहीं है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका परिवार है—वह परिवार जो व्यक्ति को जड़ों से जोड़ता है, संस्कार देता है, जीवन को साझा उत्तरदायित्व बनाता है और पीढ़ियों को एक ही सांस्कृतिक धारा में बाँधता है। यदि यह शक्ति क्षीण हुई, तो भारत केवल सामाजिक संकट का नहीं, सांस्कृतिक रिक्तता का भी सामना करेगा। इसलिए यह समय परिवार को “पुरानी व्यवस्था” मानकर त्यागने का नहीं, बल्कि उसकी मूल भावना को समझकर नए युग के अनुरूप पुनर्स्थापित करने का है। भारत को यदि अपनी सांस्कृतिक अस्मिता बचानी है, तो उसे अपने परिवार को केवल बचाना ही नहीं, फिर से जीवित भी करना होगा।


✍️कैलाश चन्द्र

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