पुराणों की कथाएँ केवल आस्था की कहानियाँ नहीं हैं, वे सिस्टम और चेतना पर गहरी टिप्पणी हैं।

भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय—
जो व्यवस्था के रक्षक थे,
उनकी लापरवाही के कारण
सनकादिक ऋषियों को श्राप देना पड़ा।

दोष द्वारपालों का था,


पर दंड केवल उन्हें ही नहीं मिला—
उसका सबसे बड़ा भार सामान्य जनता ने उठाया।

जानिए कैसे :

द्वारपाल जय बने हिरण्यकशिपु और
विजय बने हिरण्याक्ष।

• धरती को रसातल में ले जाया गया
• भय, हिंसा और दमन फैला
• साधारण जन आतंक में जीने को विवश हुए

अंततः जब कष्ट असहनीय हो गया,
तब वराह और नरसिंह अवतार आए।

उससे पहले तक—
जनता ने सब सहा।

  • दूसरा युग: त्रेतायुग

जय बने रावण,
विजय बने कुंभकर्ण।

राज्य बल से नहीं, भय से चला
• अपहरण, युद्ध, विनाश सामान्य हो गया
• निर्दोष जन युद्ध की आग में झोंक दिए गए

जब पीड़ा चरम पर पहुँची,
तब राम अवतार हुआ।
उससे पहले—
लाखों जीवन संघर्ष करते रहे।

तीसरा युग: द्वापर

जय बने शिशुपाल,
विजय बने दंतवक्र।

• अपमान, द्वेष, हिंसा बढ़ी
• समाज लगातार तनाव में रहा

जब व्यवस्था टूटने लगी,
तब कृष्ण अवतार हुआ।
महाभारत का युद्ध हुआ । भाई भाई का संहार हुआ ।

हर युग में एक बात समान रही—


अवतार तब ही आए, जब कष्ट असहनीय हो गया। उससे पहले नहीं।
और ये भी की ऐसा लगा कि समाधान भले ही उस दौर में हो गया हो लेकिन समस्या फिर भी बनी रही । जो आज भी हमें घेरे हुए है ।

अब प्रश्न उठता है—
अगर गलती द्वारपालों (सिस्टम के रक्षकों) की थी, तो युगों तक- जनता ने क्यों भुगता?

यही कथा वाली समस्या आज के समय में भी जीवित है

अवतार = सरकार ??

अगर समझने के लिये बिना आस्था को ठेस पहुँचाये , उदाहरण के तौर पर समझा जाये , कि

आज अवतार की जगह सरकारें आती हैं।
पुरानी सरकार जाती है और नई सरकार आती है।

लेकिन—

सिस्टम वही रहता है।
ब्यूरोक्रेसी वही रहती है।

नियम, प्रक्रियाएँ, बेपरवाही—वही रहती है।

अगर सिस्टम के भीतर बैठे लोग
अपनी जिम्मेदारी में चूक करें,
तो उसका असर
सीधे आम नागरिक पर पड़ता है।

फाइलें अटकती हैं


• न्याय देर से मिलता है
• सुविधाएँ बाधित होती हैं
• मानसिक, आर्थिक पीड़ा बढ़ती है

कभी-कभी किसी अधिकारी को सज़ा मिल जाती है, किसी सिस्टम-एजेंट को हटा दिया जाता है।

लेकिन जो कष्ट, अपमान और नुकसान
आम जनता ने झेला—


उसका हिसाब कौन देगा?
कौन जवाब देगा?

  • पूर्ण श्रद्धा और अदब के साथ :

अवतार, दूत, पुत्र, पैग़म्बर—सभी माध्यम हैं

ईश्वर दूत हों,
ईश्वर पुत्र हों,
पैग़म्बर हों,
या अवतार—

सभी माध्यम हैं।
समाधान नहीं।
क्योंकि समस्या तो बनी हुई हर बार है !

जैसे सरकार बदलने से

सिस्टम अपने आप शुद्ध नहीं हो जाता,


वैसे ही
केवल अवतार आने से
व्यवस्था अपने आप सही नहीं हो जाती।

जब तक
व्यक्ति की चेतना नहीं बदलती,
सिस्टम की चेतना नहीं बदलती।

पुराण स्पष्ट कहते हैं—

श्रीहरि विष्णु के द्वारपाल जय और विजय से भूल हुई।
वे सिस्टम के भीतर बैठे रक्षक थे।
गलती उनकी थी,
लेकिन उसके परिणाम तीन युगों तक जनता ने भुगते।

सवाल यह नहीं कि अवतार क्यों आए।
सवाल यह है कि
जब गलती सिस्टम के कारिंदों की थी,
तो युगों तक जनता क्यों भुगतती रही?

आज भी यही मॉडल लागू है

आज अवतार नहीं आते,
सरकारें आती हैं।
पुरानी जाती है, नई आती है—
जैसे अवतार बदलते हैं।

लेकिन
सिस्टम वही रहता है।
ब्यूरोक्रेसी वही रहती है।
फाइल, नियम, बेपरवाही वही रहती है।

  • यही पब्लिक का असली सवाल है

क्या लोकतंत्र का मतलब यह है कि—


• सिस्टम गलती करे
• जनता भुगते
• और हर कुछ साल बाद
एक “नई सरकार” को
नया अवतार मान लिया जाए?

अगर हर सरकार के बाद
समस्या वही है,
तो दोष चेहरों का नहीं—
सिस्टम की संरचना और चेतना का है।

  • सत्य दर्शन :

असल परिवर्तन तब आता है


जब पब्लिक , सिस्टम से सवाल पूछना सीखती है,
और अपनी चेतना को जाग्रत करती है।

सत्य किसी सरकार से नहीं आता।
सत्य किसी अवतार से नहीं आता।
सत्य आता है—
जाग्रत नागरिक चेतना से।

उठिये – जागिये –
अपने उद्धार या समस्या निवारण के लिये किसी का इंतजार ना करें और ना ही निर्भर हो ।

आवाज उठायें । सत्य के लिये ।

सत्यम – शिवम – सुंदरम् ।

— सत्य दर्शन

Share.
Leave A Reply