भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सह-अस्तित्व है,
धार्मिक प्रतीकों का थोपना नहीं।
लेकिन अब सवाल उठ रहा है—
क्या देश के कुछ स्कूल शिक्षा नहीं, धर्मांतरण का सॉफ्ट मॉडल चला रहे हैं?
मध्यभारत के कई विद्यालयों में
हिंदू छात्रों को बिना अभिभावकों की अनुमति क्रिसमस कार्यक्रमों में सांता क्लॉस बनने और क्रिसमस ट्री लाने के लिए कहा जा रहा है।
और यही से विवाद शुरू होता है।
- क्या विद्यालय को यह अधिकार है कि वह
हिंदू बच्चों की धार्मिक पहचान से खेले? - क्या ईसाई धार्मिक प्रतीकों को
“सांस्कृतिक कार्यक्रम” कहकर
हिंदू छात्रों पर थोपा जा सकता है?
- क्या यह Cultural Conversion का साफ मामला नहीं?
- अगर यही प्रयोग
ईद या किसी अन्य धर्म के प्रतीकों के साथ होता,
तो क्या सिस्टम चुप रहता?
विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल मध्यभारत ने साफ शब्दों में कहा है—
“हमारे बच्चे
श्रीराम बन सकते हैं,
श्रीकृष्ण बन सकते हैं,
भगवान बुद्ध, महावीर,
गुरु गोविंद सिंह,
महापुरुष और क्रांतिकारी बन सकते हैं—
लेकिन सांता क्लॉस नहीं।
यह भारत है।
संतों की भूमि है।
किसी विदेशी धार्मिक प्रतीक की प्रयोगशाला नहीं।”
क्या स्कूल
हिंदू बच्चों को सांता बनाकर
ईसाई धर्म के प्रति
श्रद्धा और भावनात्मक जुड़ाव पैदा नहीं कर रहे?
क्या यही प्रक्रिया
“मासूम उत्सव” के नाम पर
सालों से चुपचाप नहीं चल रही?
PARENT ANGLE
- बिना सहमति
- बिना विकल्प
- आर्थिक बोझ (ड्रेस, ट्री)
- आस्था का अपमान
यह केवल धर्म का नहीं,
अभिभावक अधिकारों का भी उल्लंघन है।
विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने चेतावनी दी है—
यदि किसी भी विद्यालय में
किसी भी हिंदू छात्र को
बिना अभिभावकों की लिखित अनुमति
सांता क्लॉस या ईसाई प्रतीकों में प्रस्तुत किया गया—
तो संगठन
वैधानिक और कानूनी कार्यवाही करेगा।
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