सनातन समाज से एक मूल प्रश्न लगातार टलता रहा है—
क्या किसी भी श्लोक में यह लिखा है कि सनातन निष्क्रिय रहेगा और फिर भी बच जाएगा?

भविष्यपुराण का नाम लेते ही एक सुविधाजनक धारणा बना दी गई—
“म्लेच्छ आपस में लड़ेंगे, नष्ट होंगे, और सनातन अपने आप बच जाएगा।”

लेकिन श्लोक पढ़िए।

भविष्यपुराण – प्रतिसर्ग पर्व (3.3.25–27)

“रेगिस्तानस्य भूमौ तु पिशाचः संभविष्यति।
स महामद इति ख्यातः भविष्यति महीतले॥
अधर्मप्रियतां यातः स तु म्लेच्छधर्मं चरेत्।
मायावी म्लेच्छाचार्यं तं प्राप्य धर्मं नाशयेत्॥”

अब ईमानदारी से बताइए—
• कहाँ लिखा है कि सनातन बैठे रहेगा?
• कहाँ लिखा है कि कोई अवतार आएगा और सब ठीक कर देगा?
• कहाँ लिखा है कि म्लेच्छ आपस में लड़ेंगे तो सनातन सुरक्षित रहेगा?

श्लोक सिर्फ़ यह बताता है कि
एक मायावी म्लेच्छाचार्य अधर्म फैलाएगा।
यह नहीं बताता कि सनातन समाज उस समय क्या करेगा।

यही सबसे बड़ा धोखा है।

अवतार पर अवतार — फिर भी सनातन क्यों सिमटता गया?

अगर अवतार आने से ही सब ठीक हो जाना था, तो एक सीधा सवाल है—
• राम आए → फिर भी सनातन सिमटा
• कृष्ण आए → फिर भी सनातन सिमटा
• बुद्ध आए → फिर भी सनातन सिमटा
• अब कल्कि का इंतज़ार…

तो समस्या क्या है?

समस्या अवतारों की कमी नहीं है।
समस्या समाज की निष्क्रियता है।

हिंदू मारा गया, उजड़ा, विस्थापित हुआ—
इसलिए नहीं कि भविष्यवाणी झूठी थी,
बल्कि इसलिए कि उसने भविष्यवाणी को कर्म का विकल्प बना लिया।

भविष्यपुराण में किसने म्लेच्छाचार्य का नाश किया?

यह बिंदु सबसे महत्वपूर्ण है।

भविष्यपुराण की कथा में—
म्लेच्छाचार्य / महामद का नाश किसी अवतार द्वारा नहीं होता।

कथा में जो आता है वह है कालिदास
अर्थात काली का दास,
अर्थात कालभैरव चेतना।

यह कोई देवता नहीं है जो आकाश से उतरे।
यह जागृत मानव चेतना है—
• जो भ्रम पहचानती है
• जो माया को चुनौती देती है
• जो स्वयं खड़ा होती है

यही कारण है कि कालभैरव को जानबूझकर बदनाम किया गया—
शराब, श्मशान, तंत्र से जोड़कर—
ताकि समाज भ्रम-नाशक चेतना से दूर रहे।

असल में कालभैरव का अर्थ है—
निर्णय की क्षमता, स्वरक्षा, और निर्भरता का अंत।

भविष्यवाणियों के भरोसे नहीं, स्वयं के भरोसे

अगर भविष्यपुराण को सच मानते भी हैं,
तो वह यह नहीं कहता कि—
• सरकार बचा लेगी
• अवतार बचा लेगा
• कथा सुनने से रक्षा हो जाएगी

बल्कि यह संकेत देता है कि
जो जागेगा वही बचेगा।

इसलिए अब स्पष्ट कहना होगा—

• आडंबर नहीं — अखाड़ा
• कथा नहीं — कर्म
• प्रतीक्षा नहीं — तैयारी

मंदिरों को सुरक्षित रखना है तो उन्हें निर्बल मत बनाइए

मंदिरों में आज क्या हो रहा है?

• सामग्री अर्पण
• फूल, घी, चढ़ावा
• और भविष्य के सपने

लेकिन सत्य यह है—

मंदिर तभी सुरक्षित रहेंगे
जब मंदिरों में
मज़बूत शरीर, मज़बूत मन और सजग चेतना होगी।

पूजन सामग्री से नहीं—
पसीना अर्पित करने से।
• मंदिर = अखाड़ा
• पूजा = अभ्यास
• भक्ति = अनुशासन

तभी मंदिर भी सुरक्षित रहेंगे
और समाज भी।

अब अंतिम निर्णय

भविष्यपुराण कहीं नहीं कहता कि
सनातन को बचाया जाएगा।

वह केवल यह बताता है कि
भ्रम आएगा।

अब निर्णय हमारा है—
• भ्रम में जीना है
या
• कालभैरव चेतना बनकर खड़ा होना है।

**कथा-माया के जाल से बाहर आइए।
अवतार और सरकार के भरोसे से बाहर आइए।

स्वधर्म और स्वरक्षा के लिए
स्वयं जागृत होइए।**

अब भविष्य लिखा नहीं जाएगा—
अब भविष्य बनाया जाएगा।

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