भोपाल नगर निगम के स्लॉटर हाउस में गोमांस मिलने की पुष्टि ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि
सरकारें बदलती हैं, बयान बदलते हैं, लेकिन गड़बड़ियाँ क्यों नहीं रुकतीं?

हर बार वही प्रतिक्रिया—

“जांच होगी… दोषियों पर कार्रवाई करेंगे…”

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि
कौन बयान दे रहा है,
बल्कि यह है कि
ऐसी घटनाएँ बार-बार होने का साहस सिस्टम को कहाँ से मिल रहा है?

नेता भी जिम्मेदार हैं — लेकिन जड़ ‘सिस्टम’ है

यह साफ़ समझना ज़रूरी है कि
नेताओं को पूरी तरह निर्दोष कहना भी गलत है
और हर दोष उन्हीं पर डाल देना भी अधूरा सच है।

असल समस्या है—
सरकारी तंत्र (System)

यानी:
• नगर निगम
• विभाग
• अफ़सरशाही
• ठेकेदार व्यवस्था
• और उनके नीचे काम करने वाला पूरा ढांचा

यही वह सिस्टम है जो:
• आदेशों को मोड़ देता है
• नियमों को फाइलों में दबा देता है
• और ग़लत को “रूटीन” बना देता है

सिस्टम कैसे बिगड़ा?

सिफ़ारिश और जुगाड़ से भर्ती

आज सरकारी तंत्र में बड़ी संख्या में ऐसे लोग घुस चुके हैं—
• जिनकी नियुक्ति योग्यता से नहीं
• सिफ़ारिश, दबाव या सौदे से हुई

जब प्रवेश ही गलत दरवाज़े से होगा,
तो नीयत कैसे सही रहेगी?

सरकारी नौकरी = सेवा नहीं, ‘सेटेलमेंट’

कड़वी सच्चाई यह है कि आज बड़ी संख्या में लोग सरकारी नौकरी चाहते हैं—
• देश सेवा के लिए नहीं
• बल्कि स्थायी कुर्सी + स्थायी कमाई के लिए

जहाँ:
• रिश्वत को “ऊपर की कमाई” कहा जाता है
• कमीशन को “सिस्टम का हिस्सा”
• और काम न करने को “हड़ताल का अधिकार”

Accountability का अभाव

न काम समय पर,
न फ़ैसलों की जवाबदेही,
न नुकसान की सज़ा।

और अगर कोई अधिकारी या मंत्री सख़्ती करना भी चाहे तो—
• यूनियन
• संगठन
• हड़ताल
• काम बंद करने की धमकी

पूरा सिस्टम एक-दूसरे को बचाने में लग जाता है।

ऊपर का कवर: असली सुरक्षा कवच

जब तक यह व्यवस्था रहेगी कि—
• नीचे गड़बड़ करे
• और ऊपर के बड़े अफ़सर (IAS/Head of Department) बच जाएँ

तब तक सिस्टम को कवर मिलता रहेगा।

सवाल सीधा है—

क्या कभी उस विभाग के सर्वोच्च अधिकारी को सज़ा मिलती है?
क्या कभी कहा जाता है कि “यह तुम्हारी निगरानी की विफलता है”?

अक्सर नहीं।

नेताओं की असली परीक्षा

अब सवाल नेताओं से भी है—
• क्या वे अपने “कमाऊ पूतों” पर कार्रवाई कर पाएँगे?
• उन अफ़सरों पर, जो हर नई स्कीम में करोड़ों का खेल रचते हैं?
• ऐसी स्कीमें जो काग़ज़ों में चमकती हैं,
लेकिन जनता को कभी लाभ नहीं देतीं?

क्या वे इस चेन को तोड़ने का दम रखते हैं?

या फिर हर बार—

“जांच चल रही है”
कहकर मामला ठंडा कर दिया जाएगा?

तो पब्लिक क्या करे?

सवाल पूछना बंद न करें
• केवल घटना पर नहीं
• जिम्मेदारी की चेन पर

नाम पूछिए:
किस अधिकारी की निगरानी थी
• किसकी अनुमति से हुआ
• किस स्तर पर आंख बंद की गई

“छोटा मामला” कहकर भूलें नहीं

हर गड़बड़ी को अगर छोटी मान लिया गया,
तो वही अगली बार बड़ा अपराध बनेगी।

सिर्फ नेता नहीं, सिस्टम को कटघरे में खड़ा करें
विभाग
• अधिकारी
• नियमों की अनदेखी
• और फाइलों की सच्चाई

पब्लिक प्लेटफॉर्म बनाइए, भरोसा कीजिए

कई बार चैनल और अख़बार अक्सर—
सत्ता
• विज्ञापन
• या सुविधा के बीच फँस जाते हैं

इसलिए ज़रूरत है—
ऐसे मंच की जो निर्भय हो, निष्पक्ष हो, और जनता का हो

अंतिम बात

अगर सिस्टम से सवाल नहीं पूछे गए,
तो हर पार्टी की सरकार में—
पेड़ कटेंगे
• पशु कटेंगे
• शहर बिगड़ेंगे

• और जनता हर बार बस बयान सुनती रहेगी

अब फैसला जनता को करना है—

चुप रहना है या जुड़ना है।
देखते रहना है या सवाल उठाना है।

पब्लिक फर्स्ट —

जहाँ सवाल सत्ता से ऊपर हैं,
और जनता सबसे पहले।

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