HIGHLIGHTS FIRST :
- चित्र नहीं, चेतना समझिए
- जिस काली को हम पूजते हैं, क्या वह वही है?
- काली देह या चेतना ?
- काली माता: चित्र, कथा और वास्तविक सत्य
भूमिका: पहला और सबसे ज़रूरी प्रश्न
जिन काली माता की तस्वीरें और प्रतिमाएँ आज प्रचलित हैं—
क्या उनका स्वरूप वास्तव में यही है?
• अल्प वस्त्रों में काली देह
• गले में नरमुंडों की माला
• लंबी जिह्वा बाहर की ओर
• उग्र, क्रोधी आकृति
क्या यही मूल स्वरूप है?
या यह किसी कालखंड में विकसित प्रतीकात्मक चित्रण है, जिसे समय के साथ अंतिम सत्य मान लिया गया?
इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं से नहीं,
तथ्यों, ग्रंथों और तंत्र-दर्शन से निकलेगा।
काली का सबसे प्राचीन संदर्भ: क्या वह स्त्री देह थी?
ऋग्वैदिक काल (लगभग 1500 ई.पू.)
ऋग्वेद में “काली” शब्द का प्रयोग मिलता है,
पर किसी स्त्री देवी के रूप में नहीं।
यहाँ काली—
• अग्नि देवता की सात जिह्वाओं में एक जिह्वा है
• संहारिणी, लालिमा युक्त अग्नि-शक्ति
• यज्ञ और ध्यान से जुड़ी ऊर्जा
पूजा का स्वरूप:
• अग्निकुंड
• यज्ञाहुति
• निराकार शक्ति का आवाहन
इस काल में
न काली स्त्री है, न मूर्ति, न देह-रूप।
उपनिषद् काल: काली = कालरात्रि (निराकार शक्ति)
मुण्डक उपनिषद (लगभग 600–400 ई.पू.)
यहाँ “कालरात्रि” का उल्लेख मिलता है—
• समय को नष्ट करने वाली निराकार शक्ति
• ध्यान और ब्रह्मानुभूति से जुड़ा तत्त्व
यह भी स्पष्ट है कि:
• कोई स्त्री-देह
• कोई चित्र
• कोई मूर्ति-पूजा
यहाँ नहीं है।
तांत्रिक परंपरा: महाकाल और महाकाली का मूल स्वरूप
विज्ञान भैरव तंत्र (धारा 28–29)
यहीं से महाकाल–महाकाली का स्पष्ट तांत्रिक स्वरूप सामने आता है।
तंत्र के अनुसार:
• एक काला बिन्दु है—काल-बिन्दु
• यही महाकाल है
• इसी से एक ऊर्ध्व लाल अग्नि जागृत होती है—कालाग्नि
यह कालाग्नि:
• दाहिने पैर के अंगूठे से उठती है
• ऊपर की ओर प्रवाहित होती है
• पूरे शरीर और जगत को भस्म कर
• साधक को निर्विकल्प शांति में प्रतिष्ठित करती है
यही लालिमा युक्त ऊर्ध्व शक्ति—
महाकाली है।
यहाँ:
• महाकाल = काला सूर्य / काल-बिन्दु
• महाकाली = उसी से उदित लालिमा सूर्य
यह निराकार चेतना है,
किसी स्त्री देह का वर्णन नहीं।
महाकाल को शिवलिंग कब बनाया गया?
ऐतिहासिक तथ्य
• शिवलिंग के पुरातात्विक प्रमाण: पहली–दूसरी शताब्दी ई.
• गुप्त काल (4th–6th century) में शिवलिंग पूजा व्यापक हुई
मूल रूप में:
• शिवलिंग “लिंग” नहीं
• बल्कि ज्योति-स्तंभ / काल-बिन्दु का प्रतीक था
पर समय के साथ:
• प्रतीक को ही सत्य मान लिया गया
• ध्यान की जगह कर्मकांड आया
काली को काली देह वाली स्त्री कब और कैसे बनाया गया?
पहला स्पष्ट ग्रंथीय आधार
देवीमाहात्म्य
(मार्कण्डेय पुराण, 5वीं–6वीं शताब्दी)
यहीं पहली बार काली का साकार चित्रण मिलता है:
• काला वर्ण
• जिह्वा बाहर
• मुंडमाला
• अल्प वस्त्र
• युद्धरत देवी
महत्वपूर्ण तथ्य:
देवीमाहात्म्य स्वयं इसे कथा के रूप में प्रस्तुत करता है,
न कि ध्यान-दर्शन के अंतिम सत्य के रूप में।
यह चित्रण आगे कैसे स्थापित हो गया?
8वीं–12वीं शताब्दी
• नालंदा और पूर्वी भारत में काली की मूर्तियाँ
• बंगाल शाक्त परंपरा में काली स्त्री रूप लोकप्रिय
कालिका पुराण (11वीं शताब्दी)
• काली के साकार रूप का विस्तृत वर्णन
• लोक-भक्ति के लिए कथा विस्तार
यहाँ उद्देश्य था:
• निराकार साधना को सरल बनाना
• जनसामान्य से भावनात्मक जुड़ाव
पर परिणाम यह हुआ:
ध्यान से हटकर फोकस चित्र और देह पर चला गया।
प्रतीक कैसे विकृति में बदले?
काली का काला रंग:
• मूल अर्थ: काल, शून्य
• लोक अर्थ: भय और उग्रता
जिह्वा बाहर:
• मूल अर्थ: ऊर्जा-संयम और रक्त-पतन रोकना
• लोक अर्थ: केवल क्रोध
मुंडमाला:
• मूल अर्थ: अहंकार और असत्य का नाश
• लोक अर्थ: हिंसा का प्रतीक
अल्प वस्त्र:
• मूल अर्थ: बंधन-मुक्त चेतना
• लोक अर्थ: देह-केंद्रित दृष्टि
प्रतीक समझाने के बजाय
चित्र दिखा दिए गए।
कर्मकांड और बलि कब जुड़ी?
15वीं शताब्दी के बाद
• बंगाल क्षेत्र में लोक-शाक्त परंपरा
• भय और फल-अपेक्षा का प्रवेश
• पशुबलि और बाह्य आडंबर
यह तंत्र का मूल स्वरूप नहीं,
बल्कि लोक-मानस का विस्तार था।
इससे सत्य कैसे ढँक गया?
जब:
• महाकाल को केवल शिवलिंग समझ लिया गया
• महाकाली को केवल काली देह वाली स्त्री
• और कर्मकांड को साधना
तो:
• ध्यान लुप्त हुआ
• विवेक क्षीण हुआ
• चेतना का प्रश्न समाप्त हो गया
इसके परिणाम आज क्या हैं?
- हिन्दू स्वयं स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाता—
काली कौन हैं?
- बाहरी दृष्टि:
• देहात्मक चित्रों पर प्रश्न और उपहास - समाज:
• 9 अवतार हो चुके
• 10वें की प्रतीक्षा
• पर चेतना क्रमशः क्षीण
तथ्यात्मक निष्कर्ष: असल स्वरूप क्या है?
सत्य एक है।
• महाकाल = काल-बिन्दु, काला सूर्य
• महाकाली = उसी से उदित लालिमा ऊर्ध्व अग्नि
भद्रकाली, दक्षिणा काली जैसे रूप—
• भक्ति के लिए बने निदान हैं
• परम सत्य नहीं
तंत्र का निष्कर्ष:
“रूप अनेक नहीं, तत्त्व एक है।”
अंतिम संदेश: विवेक का आह्वान
महाकाल और महाकाली
किसी चित्र या प्रतिमा में सीमित नहीं।
वे चेतना के भीतर
कालाग्नि के रूप में
विवेक से जागृत होते हैं।
कालभैरव / भैरवी की तरह
असत्य, कर्मकांड और कथा-माया को
काटना ही तंत्र का उद्देश्य है।
यही सत्य दर्शन है।
