पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन—जल, वायु, वन, खनिज, मिट्टी, जीव–जंतु और ऊर्जा-स्रोत—मानवता की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की साझा धरोहर हैं। यह विचार मात्र नैतिक आग्रह नहीं है; यह पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास, जैविक विकास और आधुनिक वैज्ञानिक समझ का गहन निष्कर्ष है। विज्ञान बताता है कि जिन ऊर्जा-स्रोतों पर आधुनिक सभ्यता खड़ी है, वे मानव जीवन के पैमाने पर अनुत्पादनीय हैं। पेट्रोलियम को बनने में 5 से 30 करोड़ वर्ष, कोयले को बनने में 3 से 40 करोड़ वर्ष, और प्राकृतिक गैस को बनने में करोड़ों वर्षों का समय लगता है। पृथ्वी की विशाल प्रयोगशाला ने जिस संसाधन को करोड़ों वर्षों में गढ़ा, उसे हम कुछ महीनों के युद्धों, संघर्षों या लालच से नष्ट कर दें—यह न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से मूर्खता है बल्कि नैतिक दृष्टि से अत्याचार भी।


भारतीय चिंतन इस वैज्ञानिक सत्य को हजारों वर्षों से आध्यात्मिक और दार्शनिक भाषा में रूपायित करता आया है। अथर्ववेद कहता है—“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”—पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि पृथ्वी के उपहार किसी एक समाज, एक राष्ट्र या एक पीढ़ी के लिए नहीं—बल्कि संपूर्ण जीव-जगत के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। इसी भावना को उपनिषद कहते हैं—“ईशावास्यमिदं सर्वं”—यह सम्पूर्ण जगत किसी का निजी स्वामित्व नहीं, बल्कि एक साझा अस्तित्व है। आधुनिक शब्दों में कहें तो यह “Global Commons” का भारतीय संस्करण है, जहाँ संसाधन किसी के स्वामित्व में नहीं, बल्कि सभी के उपयोग में होते हैं।
यही कारण है कि प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार की अवधारणा मूलतः अमानवीय है।

यदि पृथ्वी के संसाधन संपूर्ण सृष्टि के हैं, तो मनुष्य अधिकतम यह कह सकता है कि वह उनका caretaker—संरक्षक और trustee—है। उसके पास संसाधनों का प्रयोग करने का अधिकार है, लेकिन स्वामित्व का नहीं। और trustee केवल उपयोग करता है, नष्ट नहीं करता; केवल लाभ नहीं उठाता, संरक्षण भी करता है। आज विश्व के राजनीतिक और आर्थिक ढांचे ने इस मूलभूत सत्य को पीछे कर दिया है। संसाधन जो हमारी सामूहिक धरोहर थे, वे “संपत्ति”, “राजनीतिक शक्ति”, “भू-रणनीतिक हथियार” और “उद्योग-लाभ” में बदल दिए गए।
इसी कारण जब पश्चिम एशिया के तेल कुओं पर ड्रोन हमला होता है, रूस–यूक्रेन युद्ध में गैस पाइपलाइन टूटती है, अफ्रीका में खनिज क्षेत्रों पर गृहयुद्ध होते हैं—तो नुकसान किसी एक देश का नहीं, पूरी दुनिया का होता है। तेल की कीमतें बढ़ती हैं, परिवहन महंगा होता है, बिजली दरें बढ़ती हैं, खाद्य संकट गहराता है—और अंततः पीड़ित वही गरीब जनता होती है जिसने न युद्ध किया, न संसाधन लूटा। यह वैश्विक अन्याय का सबसे विकृत रूप है।


प्राकृतिक संसाधनों की हानि केवल आर्थिक संकट नहीं लाती, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन को भी हिला देती है। एक जंगल काटा जाता है तो सिर्फ पेड़ नहीं गिरते—वर्षा-चक्र, मिट्टी की उर्वरता, जल-संचयन, पक्षी और वन्य जीवों का जीवन, सब कुछ टूट जाता है। समुद्र में तेल रिसाव केवल समुद्री पारिस्थितिकी को नहीं मारता, बल्कि पूरे ग्रह में ताप-वृद्धि, कार्बन-असंतुलन और जलवायु–आपदाओं का कारण बनता है। जल-प्रदूषण एक नदी को नहीं मारता, बल्कि लाखों मनुष्यों, जानवरों और कृषि प्रणालियों को संकट में डाल देता है।
इसलिए यह कहना कि “प्राकृतिक संसाधनों की हानि एक राष्ट्र की हानि है”—अधूरा है। सच यह है कि प्राकृतिक संसाधन किसी एक राष्ट्र के नहीं, संपूर्ण पृथ्वी के हैं; और उनका नाश किसी एक का नहीं, संपूर्ण सृष्टि का नाश है।
भारतीय दर्शन में इस व्यापक दृष्टि का नाम है—वसुधैव कुटुम्बकम्। यह केवल कूटनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक दार्शनिक तत्त्व है—कि पृथ्वी हमारा परिवार है, और परिवार में संसाधनों का उपयोग “समानता”, “संयम” और “कल्याण” के आधार पर होता है। ठीक इसी दृष्टि को आधुनिक पर्यावरण दर्शन “Environmental Justice” कहता है—कि संसाधनों का समान उपयोग, समान उपलब्धता और समान संरक्षण आवश्यक है।


परंतु आज विश्व इस मार्ग पर नहीं चल रहा। जो देश संसाधनों से समृद्ध हैं, वे उन्हें हथियार या राजनीतिक दबाव के रूप में उपयोग करते हैं। और जो देश इन पर निर्भर हैं, वे दुर्बल, असुरक्षित और अस्थिर बने रहते हैं। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और सभ्यतागत असमानता है। यदि किसी को पृथ्वी ने अधिक संसाधन दिए, तो उसका पहला दायित्व होना चाहिए—“साझा धरोहर की रक्षा”—न कि “साझा धरोहर का व्यापारिक शोषण।”
यही वह क्षण है जहाँ भारतीय दृष्टि आधुनिक विश्व को एक विकल्प देती है। भारतीय परंपरा कहती है कि प्रकृति हमारी “माता” है—और माता की संपत्ति का उपयोग पुत्र समानता, सह-अस्तित्व और संयम से करते हैं। यह जीवन-दर्शन हमें “अधिक उपभोग” नहीं, “सतत उपभोग” सिखाता है। “अधिक पाने” की लालसा नहीं, “सही उपयोग” का मूल्य सिखाता है।


इसलिए आज यदि मानवता को प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष रोकना है, तो उसे इस भारतीय दृष्टि को समझना होगा—कि हम पृथ्वी के शासक नहीं, बल्कि उसके देखभाल करने वाले हैं। हम न्यासी (trustees) हैं, मालिक नहीं। न्यास (trusteeship) का सिद्धांत गांधीजी ने राजनीतिक-आर्थिक संदर्भ में प्रस्तुत किया था—कि धन-संपत्ति का उपयोग “लोकहित” में होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत लालसा में। यही सिद्धांत प्राकृतिक संसाधनों पर भी लागू होता है—कि उनका उपयोग “सृष्टि–हित” में हो, न कि “स्वार्थ–हित” में।
आज दुनिया को इस trusteeship की आवश्यकता है। यह एकमात्र दृष्टि है जो युद्धों, संसाधन-लूट, उपभोग-आधारित पूँजीवाद और पर्यावरणीय संकट के दुष्चक्र को तोड़ सकती है। यदि किसी क्षेत्र में तेल है, तो वह वहाँ के लोगों का नहीं—पूरी दुनिया का है। यदि किसी देश में विशाल वन हैं, तो वे केवल उसकी संपत्ति नहीं—पूरे ग्रह का कार्बन-संतुलन हैं। यदि किसी नदी का उद्गम किसी देश में है, तो उसका जल केवल उसी का नहीं—पूरे पारिस्थितिक तंत्र का है।


इसलिए प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकार का विचार मूलतः सीमित, स्वार्थपूर्ण और अमानवीय दृष्टि है। इसके विपरीत, भारतीय दर्शन हमें सिखाता है कि सृष्टि की रक्षा में ही मानवता की रक्षा है। प्रकृति की समृद्धि में ही सभ्यता का भविष्य है। और संसाधनों की समानता में ही विश्व–कल्याण निहित है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि वैश्विक समुदाय इस दार्शनिक और वैज्ञानिक सत्य को स्वीकार करे—कि पृथ्वी की धरोहर का संरक्षण, संतुलित उपयोग और न्यायसंगत वितरण मानवता का साझा दायित्व है। यही वह मार्ग है जो भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित, संतुलित और सामंजस्यपूर्ण संसार दे सकता है। यही वह दृष्टि है जो भारत हजारों वर्षों से संजोए हुए है—और यही वह दृष्टि है जो आज के वैश्विक संकट में मानवता को दिशा दे सकती है।
संसाधन पृथ्वी के हैं, हम केवल उनके संरक्षक हैं।
और संरक्षक का धर्म—संरक्षण है, शोषण नहीं।
इसी नैतिक सत्य में विश्व–कल्याण, वैश्विक शांति और मानवता के भविष्य की सबसे मजबूत नींव निहित है।


— कैलाश चन्द्र

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