हर नेता – चाहे वो किसी भी पार्टी का हो वो हर बार एक ही राग अलापता है । हमने इतने करोड़ की सौगात दी या हम इतने करोड़ की सौगात देंगे / विकास करवायेंगे ।
गौर किजियेगा :
हर चुनाव, हर मंच और हर विज्ञापन में एक ही राग—
“हमने इतने करोड़ की सौगात दी।”
“हमने इतने करोड़ के विकास कार्य करवाए।”
सवाल सीधा है—
ये करोड़ रुपये आए कहां से?
क्या किसी नेता ने
अपनी ज़मीन बेची?
अपनी जायदाद गिरवी रखी?
अपनी जेब से पैसा दिया?
नहीं। बिल्कुल नहीं।
तो फिर बार-बार “हमने करवाया” क्यों कहा जाता है?
सच ये है कि—
ये नेताओं की सौगात नहीं,
ये जनता के पसीने की कमाई से वसूला गया टैक्स है।
- GST
- Income Tax
- Petrol–Diesel टैक्स
- Property Tax
- Electricity Duty
- Toll
- और अब—कर्ज़ पर ब्याज
नेता सिर्फ़ मैनेजर हैं, मालिक नहीं।
सवाल जो कोई नहीं पूछता :
▪️ सरकार ये क्यों नहीं कहती कि—
“आपके दिए टैक्स से ये काम हुआ है”?
▪️ ये क्यों नहीं बताया जाता कि—
कौन-सा विभाग?
कौन-सा अधिकारी?
कितनी लागत?
कितना कमीशन?
विधानसभा में बजट :
इतनी कठिन भाषा में क्यों पेश किया जाता है
कि आम जनता समझ ही न पाए?
कर्ज़ का काला सच
देश और प्रदेशों की सरकारें करोड़ों-लाखों नहीं,
लाखों करोड़ का कर्ज़ ले रही हैं।
लेकिन सवाल ये है—
कर्ज़ लेने की ज़रूरत थी भी या नहीं?
क्या जनता से पूछा गया?
जिस काम के लिए पैसा खर्च हुआ—
क्या वो काम उस क्षेत्र की जनता चाहती भी थी?
या फिर—
फैसले ऊपर बैठे लोगों ने लिए
और बिल नीचे जनता ने चुकाया?
विकास या दिखावा?
- फ्लाईओवर चाहिए या अस्पताल?
- स्टैच्यू चाहिए या स्कूल?
- स्मार्ट सिटी बोर्ड चाहिए या पानी?
- सीमेंट कांक्रीट का जंगल चाहिये या स्वच्छ प्रकृति
- इमारतों का जाल चाहिये या साफ भूमि ?
आज विकास का मतलब बन गया है—
जो दिखे ( बिल्डिंग / सड़क ) वही विकास।
लेकिन जो ज़रूरी हो, वो ही फाइल में दबा रहता है।
PUBLIC FIRST सवाल उठाता है
- टैक्स आपका, प्रचार उनका क्यों?
- बजट जनता की भाषा में क्यों नहीं?
- खर्च से पहले जन-मत क्यों नहीं?
- हर योजना की सार्वजनिक ऑडिट क्यों नहीं?
लोकतंत्र में जनता मालिक है—
लेकिन व्यवहार में उसे ग्राहक बना दिया गया है।
पब्लिक फर्स्ट अपील :
अगली बार जब कोई नेता कहे—
“हमने करोड़ों की सौगात दी”
तो एक ही सवाल पूछिए—
“मेरे टैक्स का हिसाब कहां है?”
“कर्ज़ क्यों लिया?”
“ये काम मैंने मांगा था?”
जब तक ये सवाल नहीं पूछे जाएंगे—
तब तक “विकास”
सिर्फ़ पोस्टर और प्रचार में रहेगा।
PUBLIC FIRST :
सिस्टम से सवाल
और जनता सबसे पहले।
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