अवतार का इंतज़ार छोड़ो — क्योंकि इंतज़ार ही सबसे बड़ा पाप है

सनातन समाज को आज सबसे पहले एक भ्रम से बाहर आना होगा —
अवतार के इंतज़ार के भ्रम से।

यह बात कड़वी है, लेकिन सच है।

जब कोई समाज यह मान लेता है कि
“सब कुछ बिगड़ जाएगा, तब कोई आएगा और ठीक कर देगा”
तो वह समाज अनजाने में यह भी मान लेता है कि:
• अभी अन्याय हो तो चलने दो
• अभी अत्याचार हो तो सह लो
• अभी बलात्कार, हत्या, युद्ध हों — तो होने दो
• जब घड़ा भर जाएगा, तब कोई आएगा

यह सोच धर्म नहीं है। यह पलायन है।

  1. अवतार का इंतज़ार = पाप को सहने की अनुमति

सोचो ज़रा:

अगर किसी “अवतार” के आने से पहले
खून बहेगा, औरतें कुचली जाएँगी, समाज टूटेगा —
तो फिर उस आने वाले को
हम क्यों पूज्य मानें?

क्या वह इसीलिये आएगा कि
हम चुप बैठे रहें?
कमज़ोर बने रहें?
और सिर्फ़ देखते रहें?

अगर ऐसा है,
तो समस्या बाहर नहीं — हमारी सोच में है।

  1. सनातन कभी इंतज़ार का धर्म नहीं रहा

सच यह है कि
सनातन परंपरा कभी भी “बैठो और प्रतीक्षा करो” नहीं सिखाती।

सनातन कहता है:
• शरीर को साधो
• मन को स्थिर करो
• भय से बाहर आओ
• और अन्याय के सामने खड़े रहो

लेकिन आज क्या हो रहा है?
• पूजा है, अभ्यास नहीं
• आडंबर है, अनुशासन नहीं
• कथा है, चरित्र नहीं
• डिग्री है, लेकिन साहस नहीं

और फिर कहा जाता है —
“कोई आएगा।”

  1. अवतारवादी सोच ने समाज को निर्बल बनाया है

जब आदमी मान लेता है कि:
• मेरी रक्षा कोई और करेगा
• मेरा धर्म कोई और बचाएगा
• मेरा समाज कोई और संभालेगा

तो आदमी:
• अपने शरीर को कमज़ोर रखता है
• अपने मन को डरपोक बनाता है
• और अपने परिवार को असुरक्षित छोड़ देता है

फिर वह:
• ऊँची सैलरी को सुरक्षा समझता है
• डिग्री को शक्ति समझता है
• और सुविधा को धर्म मान लेता है

यह सनातन नहीं है।
यह आराम की गुलामी है।

  1. जागरण का मतलब मंदिर छोड़ना नहीं है

यह मत समझो कि इसका मतलब:
• पूजा छोड़ दो
• परंपरा तोड़ दो
• या संस्कृति से भाग जाओ

नहीं।

जागरण का मतलब है:
• पूजा के साथ शक्ति
• परंपरा के साथ तैयारी
• और श्रद्धा के साथ साहस

जो आदमी रोज़ आरती करता है
लेकिन अपने शरीर, मन और निर्णय को मज़बूत नहीं बनाता —
वह खुद को धोखा दे रहा है।

  1. आज ज़रूरत किस चीज़ की है

आज सनातन समाज को चाहिए:
• अवतार के इंतज़ार से बाहर निकलना
• आडंबर से बाहर आना
• लोभ–लालच–डर से ऊपर उठना
• और यह समझना कि
धर्म तब बचता है जब आदमी खड़ा होता है,
न कि जब वह प्रतीक्षा करता है

कोई भी समाज तभी जीवित रहता है
जब उसका हर व्यक्ति अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी उठाता है।

  • आडंबर नहीं – अखाड़ा चाहिये

हर मंदिर में जहाँ भी जगह हो वहाँ छोटा ही सही अखाड़े की जगह तैयार करें । कुछ निर्माण हटाना भी पड़े तो हटाये । दुकानें हटाना भी पड़े तो हटाये ।

मंदिर केवल प्रतीक्षा की जगह न रहें, वहाँ अनुशासन और अभ्यास का स्थान बने।

बच्चों को अखाड़ों में भेजो, ताकि शरीर मज़बूत हो और डर बाहर जाए। बच्चियों और महिलाओं को आत्मरक्षा के हुनर सिखाओ, क्योंकि सुरक्षा उपदेश से नहीं, अभ्यास से आती है।

पूजन सामग्री चढ़ाने से पहले, अखाड़े की मिट्टी में पसीना अर्पित करो — वही सच्ची तैयारी है।

इससे मंदिरो की भी सुरक्षा होगी और समाज की भी । अपने आप एकजुटता आयेगी और स्वास्थ्य भी ।

अवतारों का इंतजार करते भजन नही – दुष्टों का भंजन करने के लिये शक्ति साधना ।

जो समाज खुद को साधता है, उसे किसी अवतार का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।

सीधी बात

    अगर तुम कहो:

    “कुछ बहुत बुरा होगा, तब कोई आएगा”

    तो तुम यह भी कह रहे हो:

    “अभी बुरा हो, तो होने दो”

    और यही सोच
    हर सभ्यता को भीतर से मारती है।

    निष्कर्ष

    अवतार का इंतज़ार छोड़ो।
    खुद को मज़बूत करो।
    क्योंकि जो समाज खुद खड़ा नहीं होता,
    उसके लिये कोई भी नहीं आता।

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