THE PUBLIC FIRST INITIATIVE

हिंदू समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि वह संख्या में कम है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह अपनी आत्मरक्षा के लिए हमेशा किसी और पर निर्भर रहा है।

पुलिस पर।
प्रशासन पर।
सरकार पर।
किसी अवतार के आने पर।

जबकि इतिहास गवाही देता है—
अत्याचार हमेशा उसी पर होता है जो असंगठित और असशक्त होता है।

आत्मरक्षा का सत्य:

कमजोर पर ही वार होता है

यह कटु सत्य है कि—
• हिन्दू समाज अक्सर पीड़ित की भूमिका में रहा
• और पीड़ित वही होता है जो सशक्त नहीं होता

यह कहना भी सच है कि:

“हिन्दू संगठित नहीं हैं” — यह बात थोड़ी सच्चाई और ज़्यादा दुष्प्रचार है।

हिन्दू एकत्रित किए जा सकते हैं।
हिन्दू भावनात्मक रूप से जुड़ते भी हैं।

लेकिन उन्हें सशक्त बनाने पर कभी गंभीरता से काम नहीं हुआ।

न संगठन की निरंतरता,
न शारीरिक तैयारी,
न सामूहिक अनुशासन।

जिम: ताकत का भ्रम, सुरक्षा का अभाव

आज जिस जिम संस्कृति को ताकत का प्रतीक बताया जा रहा है, वह असल में—
• व्यक्तिगत है
• व्यावसायिक है
• सांस्कृतिक रूप से शून्य है

जिम में:
• हर व्यक्ति अपनी बॉडी में व्यस्त है
• कोई किसी का उत्तरदायी नहीं
• कोई सामाजिक निगरानी नहीं
• कोई सामूहिक सुरक्षा भावना नहीं

  • लव जेहाद के अड्डे भी बन जाते हैं जिम !

यही कारण है कि जिम समाज को जोड़ने के बजाय और अलग करता है।

शरीर तो बनता है,
लेकिन समुदाय नहीं बनता।

अखाड़ा: शक्ति जो समाज बनाती है

अखाड़ा केवल व्यायाम का स्थान नहीं होता।
अखाड़ा आत्मरक्षा की चेतना पैदा करता है।

अखाड़े में:
• व्यक्ति अकेला नहीं होता
• हर शरीर समाज का अंग होता है
• अनुशासन केवल शरीर का नहीं, चरित्र का होता है

अखाड़ा सिखाता है—
• डर के बिना खड़ा होना
• बिना आक्रामक हुए सजग रहना
• संकट में भागना नहीं, संगठित होना

मंदिर + अखाड़ा = सनातन रक्षा स्थल

जब अखाड़ा मंदिर से जुड़ता है,
तो वह केवल शारीरिक प्रशिक्षण केंद्र नहीं रहता।

वह बन जाता है—
• चेतना + शक्ति का संगम
• महाकाल की स्थिरता
• महाकाली की निर्भीकता

मंदिर भीतर की शक्ति जगाता है।
अखाड़ा उसे शरीर में उतारता है।

सरकार या अवतार के भरोसे मत बैठिए

इतिहास ने बार-बार सिखाया है—
• शासन बदलते हैं
• व्यवस्थाएँ देर से आती हैं
• अवतार युगों में होते हैं

लेकिन संकट तुरंत आता है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि—
“सरकार क्या करेगी?”

प्रश्न यह है कि—
हम कितने तैयार हैं?

यह तैयारी किसी को मारने के लिए नहीं,
बल्कि इसलिए कि कोई हमें नुकसान न पहुँचा सके।

अखाड़ा FIRST: आत्मरक्षा का सनातन शस्त्र

अखाड़ा FIRST कोई हथियार नहीं सिखाता।
यह सिखाता है—

• सजग रहना
• संगठित रहना
• भयमुक्त रहना

यह सदियों से हो रहे शोषण का उत्तर है—
कमज़ोरी को समाप्त करना।

जब हर मोहल्ले में:
• 20–30 सक्षम युवक-युवतियाँ होंगे
• जो एक-दूसरे को जानते होंगे
• जो संकट में साथ खड़े होंगे

तो अत्याचार अपने-आप रुकता है।

हर मोहल्ला = एक रक्षा इकाई

अखाड़ा FIRST से पैदा होंगे—
• मोहल्ला-स्तरीय रक्षक दल
• महिला आत्मरक्षा समूह
• आपदा में तत्पर नागरिक

यह कोई समानांतर सेना नहीं,
बल्कि जिम्मेदार, सजग नागरिक समाज है।

इसीलिए इसे जोड़ा जा सकता है—
• कम्यूनिटी पुलिसिंग से
• आपदा प्रबंधन से
• महिला सुरक्षा जागरूकता से

आडंबर छोड़िए, अखाड़े में लगाइए

हम खर्च करते हैं—
• दिखावटी आयोजनों पर
• अनावश्यक तामझाम पर
• खोखली धार्मिकता पर

लेकिन वही संसाधन अगर लगें—
• मिट्टी अखाड़ों में
• दंड-बैठक में
• योग और आत्मरक्षा में

तो हर घर सशक्त हो सकता है।

कथाओं से बाहर आइए, भीतर शक्ति जगाइए

कथाएँ प्रेरणा देती हैं,
लेकिन शक्ति अभ्यास से आती है।

अब समय है—
• आडंबर छोड़ने का
• निर्भरता छोड़ने का
• प्रतीक्षा छोड़ने का

और भीतर—
महाकाली और महाकाल का आह्वान करने का।

निष्कर्ष: अखाड़ा FIRST क्यों?

क्योंकि—
• अत्याचार कमजोर पर होता है
• सुरक्षा संगठन से आती है
• शक्ति अभ्यास से बनती है

जिम नहीं, अखाड़ा।
आडंबर नहीं, अखाड़ा।

निर्भरता नहीं, आत्मशक्ति।

अखाड़ा FIRST —
सनातन समाज की आत्मरक्षा का मार्ग।

आप भी अखाड़ा फर्स्ट से जुड़ना चाहते हैं तो अपनी जानकारी निम्न नंबर पर वॉट्स एप करें । 9617652121
ये मिशन पूरी तरह निःशुल्क और सनातन समाज के सहयोग पर आधारित है ।

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