उद्धारक-मिथक से बाहर निकलकर आत्म-जागृति की पुकार

हर युग में सनातन समाज ने किसी न किसी रूप में “उद्धारक” की प्रतीक्षा की है। कभी यह प्रतीक्षा अवतार के आगमन की रही, कभी किसी शक्तिशाली राजा की, और आज—कल्कि के नाम पर। प्रश्न यह है कि क्या यह प्रतीक्षा हमें सशक्त बना रही है या निष्क्रिय?

इतिहास साक्षी है कि राम चक्रवर्ती सम्राट थे, फिर भी उनके बाद सनातन की भौगोलिक-राजनीतिक शक्ति सिकुड़ती गई। कृष्ण के समय धर्म का संदेश विश्वव्यापी था, पर उनके पश्चात भी सनातन विश्व के अधिकांश हिस्सों से सिमटकर भारतीय उपमहाद्वीप तक रह गया। यह सिकुड़न केवल बाहरी आक्रमणों से नहीं, आंतरिक निष्क्रियता और आत्म-आश्वासन से भी हुई।

आज के परिदृश्य पर नज़र डालें—बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर अत्याचार की खबरें हों, कश्मीर में हिन्दुओं को भगाने की वारदातें हों या भारत के कई हिस्सों में मज़हबी दबाव, जबरन/प्रलोभन-आधारित परिवर्तन की शिकायतें हों, या पहचान-राजनीति के कारण समाज का विखंडन—चित्र चिंताजनक है।

इसी बीच, सनातन समाज का बड़ा हिस्सा कथा-भजन-नारों तक सीमित होता दिखता है; व्यवस्थित संगठन, सामुदायिक सुरक्षा और नागरिक अनुशासन पर अपेक्षित निवेश कम है।

आज का युवा हिन्दू सिर्फ रोज़गार, पढ़ाई और आर्थिक दबाव में जूझ रहा है—यह स्वाभाविक है।

  • लेकिन समानांतर रूप से, दूसरी ओर सुनियोजित फंडिंग, नेटवर्किंग और प्रशिक्षण से लैस समूह अपनी रणनीतियाँ बना रहे हैं—यह भी सबके सामने है। अंतर यही है: एक ओर तैयारी, दूसरी ओर प्रतीक्षा।
  • यह प्रश्न असहज है, पर आवश्यक:

क्या हम अवतार के भरोसे अपनी ज़िम्मेदारी टाल रहे हैं?

श्री राम के होते हुए सीता माता का अपहरण हुआ—अधर्म का अंत एक क्षण में नहीं हुआ।

श्री कृष्ण के होते हुए भी युद्ध टला नहीं—क्योंकि धर्म की स्थापना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, समाज की सामूहिक चेतना का परिणाम होती है।

  • फिर आज जिन कल्कि अवतार के आगमन की बातें चल रही हैं, उनसे हम किस प्रकार का परिवर्तन अपेक्षित कर रहे हैं—यदि हम स्वयं तैयार नहीं?
  • दूसरे पंथों की कथाएँ भी देखें—वहाँ भी मसीहा/महदी की प्रतीक्षा का उल्लेख है। फर्क यह है कि कई समाज प्रतीक्षा के साथ तैयारी करते हैं

—संगठन, अनुशासन, संसाधन और नेटवर्क पर काम करते हैं। यहाँ चिंता यह है कि हिंदू समाज व्यापार और निजी जीवन में व्यस्त होकर सार्वजनिक सुरक्षा और संगठन को सरकार या भविष्य पर छोड़ देता है।

सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है, पर इतिहास बताता है कि जब तक समाज स्वयं जागृत नहीं होता, सुरक्षा-व्यवस्थाएँ भी सीमित प्रभाव दिखाती हैं। सुरक्षा बल तब भी थे—फिर भी जहाँ समुदाय बिखरा, वहाँ नुकसान हुआ। हौसला, एकता और अनुशासन—इनके बिना किसी भी व्यवस्था की धार कुंद पड़ जाती है।

  • तो समाधान क्या है?

भ्रम से बाहर आइए—पर कानून और विवेक के भीतर।

• मंदिरों और सामुदायिक स्थलों को केवल अनुष्ठान का नहीं, समाज-निर्माण का केंद्र बनाइए।
• शारीरिक-मानसिक फिटनेस, आपदा-प्रबंधन, कानूनी आत्म-रक्षा, नागरिक प्रशिक्षण और समुदाय-वॉच जैसे वैध कार्यक्रम शुरू हों।
• संगठन और नेटवर्क बने—स्थानीय स्तर पर, पारदर्शी फंडिंग के साथ।
• धनाढ्य वर्ग दान को केवल मंचों तक सीमित न रखे; स्थायी ढाँचे (शिक्षा, खेल, प्रशिक्षण, सहायता-कोष) खड़े करे।
• युवाओं को आत्मविश्वास, अनुशासन और सेवा-भाव सिखाया जाए—न कि केवल प्रतीक्षा।

यह लेख किसी अवतार का अपमान नहीं, उद्धारक-मिथक के दुरुपयोग पर चेतावनी है। धर्म का अर्थ निष्क्रियता नहीं; कर्तव्य है।

यदि हम आज भी केवल सरकार, कथा या भविष्य पर निर्भर रहे, तो कमजोर पड़ता सनातन समाज इतिहास की किताबों में सिमट सकता है।

सत्य एक है । सत्य शिव है। शिव ही शक्ति है।
शक्ति का अर्थ—जागृति, संगठन और जिम्मेदारी।

कालभैरव-भाव—अर्थात भय नहीं, सजगता और अनुशासन।

अब निर्णय हमारा है: प्रतीक्षा या तैयारी?

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