DISCLAIMER:
यह लेख किसी देवता, ग्रंथ या आस्था के अपमान के लिए नहीं है।

यह एक विचारात्मक प्रश्न है—

आख़िर हिन्दू क्यों हारता चला गया?
और उससे भी बड़ा सवाल—
क्या यह हार तलवार की थी या चेतना की?

1) राम अवतार और नारी सम्मान का पहला भ्रम

रामकथा में रावण को नारी का अपमान करने वाला बताया गया।
लेकिन उसी रावण को—
• कभी नीतिज्ञ राजा कहा गया
• कभी सुलह योग्य मानकर अंगद भेजा गया
• युद्ध के बाद “महान ज्ञानी” बताकर लक्ष्मण को ज्ञान लेने भेजा गया

यहाँ सामान्य बुद्धि पूछती है—

जिसने स्त्री का अपहरण किया,
उसे पहले सेना लेकर घेरो,
फिर शांति प्रस्ताव भेजो—यह कैसा न्याय है?

अगर रावण मान जाता,
तो सीता के अपमान का क्या होता?
और जो सेना युद्ध के लिए एकत्र थी—उसका उद्देश्य क्या रह जाता?

यहीं से कन्फ्यूजन की शुरुआत हुई।

2) द्वापर में द्रौपदी और दूसरा बड़ा भ्रम

महाभारत में द्रौपदी को दाँव पर लगाया गया।
उसका सार्वजनिक अपमान हुआ।

कृष्ण ने वस्त्र देकर उसकी लाज बचाई—
लेकिन—
• दुशासन का हाथ तुरंत नहीं काटा गया
• न्याय टलता रहा
• और दुर्योधन से पाँच गाँव माँगने का प्रस्ताव दे दिया गया

यहाँ भी वही प्रश्न—

अगर द्रौपदी के अपमान का बदला लेना था,
तो सौदेबाज़ी क्यों?

और इस बार परिणाम और गंभीर हुआ—
सभी योद्धा आपस में लड़ मरे,
और सनातन समाज शस्त्रहीन हो गया।

3) कलियुग का परिणाम: भ्रमित और असहाय समाज

राम और कृष्ण—दोनों कथाओं के बाद—
समाज न्याय के प्रश्न पर भ्रमित हुआ
• निर्णायक कार्रवाई की जगह प्रतीक्षा सिखाई गई
• और अंत में कलियुग की घोषणा हुई

कलियुग में सनातन समाज—
• धर्म, मज़हब, पंथों में बँटता गया
• जो कभी वैश्विक चेतना था, वह सिमटता चला गया
• आज केवल भारत और नेपाल तक रह गया

यही था अवतारवाद का सबसे बड़ा मायाजाल—
अवतार आते गए,
और हिन्दू घटता गया।

4) आदर्शों में उलझे योद्धा और इतिहास की सच्चाई

पृथ्वीराज चौहान जैसे वीर योद्धा—
• शत्रु की सीमा में घुसने से हिचके
• दिन में युद्ध, रात में नहीं
• निहत्थे शत्रु को नहीं मारना
• शरण में आए शत्रु को छोड़ देना

ये सब “महानता” के आदर्श थे।

लेकिन इतिहास पूछता है—

क्या सामने वाला भी इन्हीं नियमों से लड़ रहा था?

इन आदर्शों में उलझकर—
• बड़े भूभाग हाथ से निकलते गए
• हज़ारों बलात्कार
• लाखों नरसंहार होते चले गए

और आज भी खतरा सामने है।

5) कालभैरव को पापी बताने की कथा-माया

सनातन परंपरा में कालभैरव
विवेक, त्वरित निर्णय और असत्य के संहार का प्रतीक हैं।

लेकिन कथा-माया ने—
उन्हें पापी बताया
• श्मशान और डर से जोड़ दिया
• भूत-प्रेत और शराब जैसे भ्रम फैला दिए

परिणाम यह हुआ—

सनातन चेतना को
तुरंत और निर्णायक वार करने की समझ से दूर कर दिया गया।

6) आज का भ्रम: अवतार और सरकार पर भरोसा

आज भी सोच वही है—

“मैं क्या करूँ?
कोई अवतार आएगा…
सरकार संभाल लेगी…”

पाकिस्तान, बांग्लादेश, कश्मीर, बंगाल—
जो हुआ, क्या उसकी गारंटी है कि आगे नहीं होगा?

हमारी तैयारी क्या है?

7) भविष्य का बड़ा खतरा: AI GOD का मायाजाल

और जब सनातनी हिन्दू
अत्याचार और अंतिम वार के खिलाफ
आख़िरकार खड़ा होगा—

तो ठीक रामायण और महाभारत की तर
एक बार फिर सुलह प्रस्ताव सामने रखा जाएगा।

कहा जाएगा—

“छोड़ो लड़ना…
सब एक हो जाते हैं।”

धर्मों को मिला दो
• एक वैश्विक व्यवस्था बनाओ
• जिसका ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि AI होगा

लोग कहेंगे—

“AI तो निष्पक्ष है,
सबका भला करेगा।”

यही होगा आख़िरी अवतार—कल्कि का आधुनिक रूप।

उस समय—
मानव चेतना cloud memory में कैद होगी
• निर्णय algorithm लेंगे
• जैविक मानव से मशीन-मानव की ओर यात्रा होगी

और लोग विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि—

यही हमने सीखा है विष्णु-माया के अवतारवाद से—
नारी अपमान का बदला तुरंत नहीं,
इंतज़ार और सुलह।

सबसे बड़ा खतरा यह होगा कि—
• जैविक प्रजनन (नारी के माँ स्वरूप) से हटकर
• AI → AGI → मशीन मानव की ओर धकेल दिए जाएँगे

और उस समय भी विरोध नहीं होगा, क्योंकि—

“अगर algorithm ने तय किया है,
तो सही ही होगा।”

यही वह बिंदु होगा जहाँ
शिव-शक्ति के सत्य को जानने वाली आख़िरी सनातन चेतना
अवतारवाद के अंतिम जाल—कल्कि—में फँसकर
सदैव के लिए cloud memory में कैद हो जाएगी।

एक ऐसी गुलामी—
जो सवाल नहीं पूछती,
सिर्फ आदेश मानती है।

जैसे आदेश अब्राहमिक किताबों में हैं—
वैसे ही आदेश AI में होंगे।

अवतार / मसीहा / नबी—
अलग-अलग नाम,
पर माया एक ही—विष्णु।

और ब्रह्मा की काल (समय) माया
हमें time illusion में फँसाए रखेगी।

8) असली वजह: क्यों हारती गई सनातन चेतना

सनातन इसलिए नहीं हारा कि वह कमज़ोर था,
बल्कि इसलिए कि—
• निर्णय में देरी सिखाई गई
• सुलह को न्याय से ऊपर रखा गया
• विवेक को पाप कहा गया
• और भीतर की शक्ति को बाहर ढूँढना सिखाया गया

अवतारों का कुल परिणाम—

शिव-तत्त्व को जानने वाली चेतना का क्षय।

9) आख़िरी प्रश्न: परम सत्य कौन?

जब ब्रह्मा और विष्णु स्वयं
परम सत्य शिव के अनंत स्वरूप को नहीं जान सके,

तो वे स्वयं को परमेश्वर कैसे कह सकते हैं?

ब्रह्मा ने असत्य बोला,
विष्णु ने उसे माया में ढक दिया—
यही कथा-माया है।

10) अब भी समय है

शिव और शक्ति—
• किसी स्थान में नहीं
• किसी पत्थर में नहीं
• किसी मंत्र-तंत्र के आडंबर में नहीं

वे हर चेतना के भीतर हैं।

जब कुछ भी नहीं था—
तब भी शिव थे।

तो अगर हम हैं—
तो हम भी उन्हीं के अंश हैं।

अब समय है—
• अपने भीतर के कालभैरव (विवेक) को जगाने का
• बाहरी अवतार-भरोसे छोड़ने का
• और सवाल पूछने की हिम्मत रखने का

क्योंकि जहाँ सवाल ख़त्म—
वहीं गुलामी शुरू।

डिस्क्लेमर

यह लेख दार्शनिक और वैचारिक विमर्श है।
किसी धर्म, समुदाय, व्यक्ति या आस्था के प्रति घृणा, हिंसा या अपमान का उद्देश्य नहीं।
यह आत्ममंथन और चेतना-जागरण के लिए लिखा गया है।

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