शनिवार का दिन बस्तर के इतिहास में एक अविस्मरणीय अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। संभाग स्तरीय ‘बस्तर पंडुम 2026’ के शुभारंभ अवसर पर देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर की आदिम संस्कृति का सजीव और जीवंत स्वरूप प्रत्यक्ष रूप से देखा।
इस गरिमामयी अवसर पर बास्तानार क्षेत्र के आदिवासी युवाओं द्वारा प्रस्तुत विश्व-प्रसिद्ध ‘गौर नृत्य’ ने पूरे परिसर को ढोल की थाप और घुंघरुओं की झनकार से गुंजायमान कर दिया। राष्ट्रपति ने इस मनोहारी प्रस्तुति का तन्मयता से अवलोकन किया और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निकट से महसूस किया।
‘गौर नृत्य’ में दिखी माड़िया जनजाति की संस्कृति
बास्तानार के युवाओं द्वारा प्रस्तुत यह नृत्य केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन भर नहीं था, बल्कि ‘दंडामी माड़िया’ (बाइसन हॉर्न माड़िया) जनजाति की परंपराओं, जीवन-दर्शन और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज़ था।
पुरुष नर्तकों के सिर पर सजे गौर के सींगों वाले मुकुट, जिन्हें कौड़ियों और मोरपंखों से अलंकृत किया गया था, आदिवासी समाज के वन्य जीवन और गौर पशु के प्रति गहरे सम्मान को प्रदर्शित कर रहे थे। वहीं महिला नर्तकियों ने पारंपरिक साड़ियों और आभूषणों के साथ ‘तिरूडुडी’ (लोहे की छड़ी) को भूमि पर पटकते हुए ताल दी, जिससे वातावरण मंत्रमुग्ध हो गया।
नृत्य के दौरान पुरुष नर्तकों ने गले में टंगे भारी ‘मांदरी’ (ढोल) को बजाते हुए जंगली भैंसे की ऊर्जावान और आक्रामक मुद्राओं की प्रभावशाली नकल प्रस्तुत की। दर्शकों को ऐसा अनुभव हुआ मानो वे जंगल के प्राकृतिक परिवेश के प्रत्यक्ष साक्षी बन गए हों।
सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता का संगम
गोलाकार घेरे में थिरकते युवक और कदम मिलाती युवतियों ने यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी बस्तर ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को गर्व और निष्ठा के साथ संजोकर रखा है।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की गरिमामयी उपस्थिति में बास्तानार के कलाकारों की यह सशक्त प्रस्तुति न केवल बस्तर पंडुम 2026 की भव्य सफलता का प्रतीक बनी, बल्कि इसने बस्तर की लोक-कला, जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक वैभव को राष्ट्रीय पटल पर प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया।
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