नई दिल्ली:
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्र, धर्म और वैश्विक भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण और वैचारिक रूप से गंभीर बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत का कोई किसी से द्वेष नहीं है, लेकिन अब समय आ गया है कि भारत धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से दुनिया का मार्गदर्शन करे

भागवत ने स्पष्ट कहा कि “दुनिया तभी हमारी बात सुनेगी जब हम शक्तिशाली होंगे।” यह बयान भारत के वैश्विक नेतृत्व, आध्यात्मिक दायित्व और राष्ट्र के आत्मबल को लेकर RSS की सोच को दर्शाता है।


मोहन भागवत ने क्या कहा?

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा:

  • “भारत किसी से द्वेष नहीं रखता, न ही किसी को छोटा समझता है।”
  • “भारत का कर्तव्य है कि वह विश्व को धर्म और सत्य का मार्ग दिखाए।”
  • “लेकिन ये तभी संभव है, जब हम आर्थिक, सैन्य और सांस्कृतिक रूप से आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनें।”
  • “शक्ति के बिना धर्म की बात दुनिया नहीं सुनती। हमारी संस्कृति का प्रचार तभी संभव होगा, जब भारत आत्मविश्वास से भरा हो।”

भारत की वैश्विक भूमिका पर जोर

भागवत ने अपने भाषण में भारत की ऐतिहासिक भूमिका की याद दिलाते हुए कहा कि:

“भारत ने कभी दुनिया पर आक्रमण नहीं किया, बल्कि उसने ज्ञान, शांति और धर्म फैलाया है। आज जब दुनिया उथल-पुथल में है, तो भारत के पास एक बार फिर उसे दिशा दिखाने की जिम्मेदारी है।”


भाषण का राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत:

  • वैश्विक मंचों पर अपनी छवि मजबूत कर रहा है
  • जी-20 जैसे आयोजनों में नेतृत्व कर चुका है
  • धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है

RSS लंबे समय से यह विचार रखता आया है कि भारत को “विश्वगुरु” की भूमिका फिर से निभानी चाहिए — लेकिन आधुनिक परिप्रेक्ष्य में, जिसमें संघर्ष नहीं, बल्कि संस्कृति के बल पर नेतृत्व हो।


बयान पर प्रतिक्रिया

भागवत के इस बयान को लेकर देशभर में चर्चा शुरू हो गई है:

  • संघ समर्थकों ने इसे आत्मगौरव का प्रतीक बताया
  • विपक्षी दलों और कुछ विश्लेषकों ने इसे ‘हिंदुत्व की वैश्विक एजेंडा सेटिंग’ कहकर आलोचना की

हालांकि, भागवत ने अपने पूरे संबोधन में किसी विशेष धर्म या समुदाय के खिलाफ कुछ नहीं कहा, बल्कि धर्म को व्यापक रूप में — “सत्य, करुणा, सह-अस्तित्व” — के रूप में प्रस्तुत किया।

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