HIGHLIGHTS FIRST :

  • सुहाना सफर” एक कार्यक्रम नहीं, एक जीवन दर्शन था
  • ⁠यातायात से जुड़े सभी चालकों एवं सहचालकों के प्रति सहानभूति एवं धन्यवाद का अनूठा प्रयास
  • मंज़िल पर पहुँचाने वालों को मिला सम्मान – सुहाना सफर का सुनहरा पड़ाव
  • जहाँ मुसाफिरों की गिनती होती रही, वहाँ पहली बार सारथियों को मिली पहचान”*

भोपाल, सुख शांति भवन नीलबड़ | 13 जुलाई 2025

जीवन एक निरंतर चलती यात्रा है… जिसमें हम सभी मुसाफिर हैं। किन्तु हर मुसाफिर की मंज़िल तक पहुँचने के पीछे कोई न कोई अनदेखा सारथी अवश्य होता है — वह जो स्वयं दृश्य में नहीं होता, परन्तु सम्पूर्ण यात्रा का मूल आधार होता है।

वरिष्ठ राजयोगी भ्राता रामकुमार जी, ने कार्यक्रम के प्रारंभ में “सुहाना सफर” की वास्तविक भावना उपस्थितजनों को स्पष्ट करते हुए बताया कि आज तक हम सबने अनेक यात्राएं की हैं — कभी ट्रेन से, कभी विमान से, बस या टैक्सी से, लेकिन क्या हमने कभी उन ड्राइवरों को धन्यवाद दिया, जो न जाने कितनों को सुरक्षित मंज़िल तक पहुंचाते हैं? इस भावना को जाग्रत करने के लिए ही ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के सहयोगी निकाय “राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन” के ट्रांसपोर्ट एंड ट्रेवल विंग द्वारा यह सुंदर कार्यक्रम आयोजित किया गया — एक प्रयास उनके लिए, जिनके बिना हमारी यात्रा अधूरी होती है।

कार्यक्रम के आरंभ में आदरणीय नीता दीदी, सुख शांति भवन की निदेशिका, ने ईश्वरीय स्मृति से कार्यक्रम की शुरुआत की और अपने स्नेहमयी शब्दों से आए हुए सभी अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने यह भी बताया कि जब कोई व्यक्ति “यात्रीगण कृपया ध्यान दें” जैसे संदेश सुनता है, तो भीतर एक नई ऊर्जा जागती है, एक नया उमंग पैदा होता है। उसी ऊर्जा को यह कार्यक्रम आज आप सब तक अवश्य पहुंचाएगा।

इसके पश्चात श्री विनोद जैन,( ट्रक ट्रांसपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन भोपाल के सचिव), ने संस्था द्वारा ट्रांसपोर्ट से जुड़े लोगों के लिए आयोजित इस पहल की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ड्राइविंग करने वाले लोग अत्यंत कठिन जीवन जीते हैं — वे लगातार गाड़ी चलाते हैं, मानसिक तनाव से जूझते हैं और सम्मान से वंचित रहते हैं। ऐसे में यह संस्थान उन्हें शांति और आत्मबल प्रदान करने का कार्य कर रहा है।

श्री राकेश चोपड़ा (इंडियन टूरिस्ट ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के जोनल अध्यक्ष) ने भी अपनी अनुभूति साझा करते हुए यह स्पष्ट किया कि किसी भी यात्रा में सबसे मुख्य भूमिका ड्राइवर की होती है — जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके संगठन द्वारा अच्छे व्यवहार वाले चालकों को पुरस्कृत किया जाता है, और इस तरह के प्रोग्राम उस भावना को और सुदृढ़ करते हैं।

इसी क्रम में श्री कमल पंजवानी जी (अध्यक्ष ट्रक ट्रांसपोर्ट असोसिएशन भोपाल) ने भी अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि ड्राइवर्स भी कलाकारों जैसे होते हैं — जिनका उत्साह तभी बढ़ता है जब उन्हें ताली और मान्यता मिलती है। जब वे स्वयं ऊर्जावान होंगे, तभी यात्रियों का सफर भी सच में सुहाना हो सकेगा।

कार्यक्रम में एक अनुपम गीत की प्रस्तुति भी हुई, जिसमें रुपेश प्रजापति एवं ऋषिका प्रजापति ने “यूं ही कट जायेगा सफर साथ चलने से” जैसे गीत के बोलों से सभी के दिलों को छू लिया।

पोस्ट मास्टर जनरल (म.प्र.) श्री विनीत कुमार माथुर ने बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था में ट्रांसपोर्ट सेक्टर का विशाल योगदान है। डाक सेवा की 700 गाड़ियों को संभालने वाले ड्राइवरों के संतुलन और मन:शांति के लिए ऐसे आयोजनों की नितांत आवश्यकता है।
भिलाई छत्तीसगढ़ से पधारे महामंडलेश्वर डॉ. सुनील शुक्ला जी, ने कहा किया कि जैसे ही वे इस प्रांगण में आए, उन्हें एक अद्भुत शांति और आनंद की अनुभूति हुई – एक अनुभव जो सामान्य स्थानों में नहीं होता।
इसके उपरांत बीके कविता दीदी, (ट्रांसपोर्ट विंग की राष्ट्रीय संयोजिका,) ने “सुहाना सफर” को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन के गहन संदेशों वाली एक आध्यात्मिक यात्रा में बदल दिया।
उन्होंने सभी को AI के माध्यम से निर्मित प्रतीकात्मक ट्रेन द्वारा एक यात्रा पर ले गए।— जिसमें हर स्टेशन, जीवन के एक मूल्य और अनुभव से परिचित कराता रहा।

यात्रा की शुरुआत जॉय जंक्शन से हुई, जहां जंगल सफारी के माध्यम से यह बताया गया कि जैसे जंगल में विभिन्न पशु–पक्षी होते हुए भी संगठन बना रहता है, वैसे ही समाज और परिवार में भी हमें एकता बनाए रखनी चाहिए। जिराफ के लंबे गले से दूरदृष्टि की सीख मिली, शेर की एकाकी चाल से आत्मनिर्भरता का बोध हुआ।

फिर ट्रेन पहुँची भोला नगर , जहां उन्होंने ‘भोला’ शब्द के तीन अर्थ बताए — पहला, बच्चों सा निष्कलंक व्यवहार; दूसरा, आंतरिक पवित्रता, संतत्व; और तीसरा, अपनी उपस्थिति से सुगंध फैलाना। उन्होंने कहा कि संत कोई वस्त्र या गहनों से नहीं, विचारों की पवित्रता से बनता है।

इसके बाद आया सरलपुर — जहाँ उन्होंने बताया कि संवाद में सरलता कितनी आवश्यक है। कई बार लोग कहते हैं कि हम समझाते हैं, पर ये समझते नहीं। दरअसल, कठिन शब्दों और भारी भाषा के कारण संवाद सहज नहीं रह पाता। भाषा में प्रेम हो, सहजता हो, तो वह हृदय तक पहुँचती है।

इस यात्रा में एक क्षण ऐसा भी आया जब ट्रेन को रेड लाइट पर रुकना पड़ा — एक विराम, एक मौन, एक ट्रैफिक कंट्रोल — जैसे मन को थाम लेने का अभ्यास। वहाँ सभी ने तीन मिनट का मौन ध्यान किया, और अपने विचारों को शांत करने का अनुभव प्राप्त किया।

अगला स्टेशन था खुशियों का चौराहा, जहाँ गीत और संदेश के माध्यम से बताया गया कि हर परिस्थिति में शांत और संतुलित रहना ही असली जीवन अनुशासन है। अगर हम अपने वर्तमान को श्रेष्ठ बना लें, तो भविष्य की चिंता अपने आप समाप्त हो जाती है।

इसके बाद आया हिल स्टेशन — जहाँ जीवन के उतार-चढ़ाव को स्वीकारते हुए यह बताया गया कि जीवन में ‘बाय-बाय’ नहीं, बल्कि ‘वाह-वाह’ की भावना होनी चाहिए। एक छोटा-सा गलत शब्द, एक असंयमित प्रतिक्रिया — पूरे रिश्ते की बुनियाद को डगमगा सकती है। इसलिए ध्यान रखें, मन और वाणी की सावधानी से ही यात्रा सुखद बनती है। और जैसे हिल स्टेशन पर कभी नेटवर्क नहीं रहता, वैसे ही जीवन में कभी-कभी हमें नो नेटवर्क जोन अपनाना चाहिए — बिना मोबाइल के कुछ पल बिताकर अंतरात्मा से जुड़ना चाहिए।

अंतिम स्टेशन था योगी नगर, जहाँ उन्होंने स्पष्ट किया कि योग का अर्थ केवल आसन नहीं, बल्कि संयम, संतोष, मर्यादा और कृतज्ञता है। जीवन में यदि संतुलन और प्रसन्नता चाहिए, तो आहार, व्यवहार और विचार — सबमें योग हो।

इस प्रकार यह सफर बाह्य से आंतरिक यात्रा में परिवर्तित हो गया — एक अनुभूति बन गया।

कार्यक्रम के बताया गया कि ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा एक सुंदर “Thank You कार्ड” भी बनाया गया है जो कि हर यात्रा के अंत में ड्राइवर और सहभागीयो को भेंट किया जाता है, जिसमें लिखा है “मंज़िल पर पहुँचाया, मिटाया इंतज़ार — अच्छा निभाया आपने सारथी का किरदार।”

कार्यक्रम के अंत में सभी को ईश्वरीय सौगात भेंट की गई, प्रसाद स्वरूप ब्रह्मा भोज कराया गया, और हृदय में नई ऊर्जा, सम्मान और शांति के साथ सभी ने प्रस्थान किया।

“सुहाना सफर” एक कार्यक्रम नहीं, एक जीवन दर्शन था — जिसने यह स्मरण कराया कि यात्रा की असली सुंदरता मंज़िल में नहीं, बल्कि उन कंधों में है जो हमें वहाँ तक लेकर जाते हैं।

publicfirstnews.com

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