मुख्य बिन्दू : HIGHLIGHTS FIRST

  • क्या स्वयं द्वारा रचित सृष्टि के विनाश के लिये ब्रह्मा जी वरदान दे सकते है ?
  • ⁠क्या पालनहार विष्णु के विरुद्ध उन्हीं की नाभिकमल में विराजित ब्रह्मा जी असुरों को वरदान दे सकते हैं ?
  • पढ़िए यह गूढ़ लेख जो असुरों की शक्ति के वास्तविक स्रोत — पंचम ब्रह्मा — का राज खोलता है
  • जानिए वह ब्रह्मा कौन था जो असुरों को वरदान देता था ?

प्रस्तावना:

पौराणिक कथाओं में यह विरोधाभास सदैव रहा है कि राक्षस–असुर–दैत्य जैसे अधर्मात्मा पात्रों को ब्रह्मा जी द्वारा वरदान क्यों और कैसे मिलते हैं?

क्या सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी अपनी ही रचना को नष्ट करने वालों को शक्तियां देंगे?

नहीं!

यह एक गूढ़ रहस्य है जो सनातन के मूल ग्रंथों से षड्यंत्र पूर्वक या तो छिपा दिया गया — या फिर ये गलत व्याख्या का शिकार हो गया !

असुरों को वरदान देने वाला ‘ब्रह्मा’ वो नहीं, जो विष्णु के नाभिकमल पर विराजित हैं।
बल्कि वो है शिव द्वारा दंडित किया गया “पंचम सिर” — अहंकार और वासना का ब्रह्मा!

1. ब्रह्मा के पांचवें सिर का संहार:

• पुराणों के अनुसार ब्रह्मा के पांच मुख थे: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊपर (ऊर्ध्वमुख)।

• पंचम मुख (ऊर्ध्वमुख) अहंकार, वासना और अज्ञान से ग्रसित था।

• शिव जी ने कालभैरव को आदेश देकर इसे काट डाला, क्योंकि वह नियमों और मर्यादा का उल्लंघन कर रहा था — विशेषकर माता सरस्वती ( शतरुपा ) की ओर वासनात्मक दृष्टि के कारण।

यह वही “कटे हुए सिर” की चेतना है जिसे असुर, राक्षस और दैत्य तांत्रिक उपासना द्वारा साधते थे।

2. असुरों की आराधना — तंत्र आधारित, अहंकार मूलक:

• असुर कभी भी विष्णु या शिव की सात्विक उपासना नहीं करते थे।

• वे बलि, मांस, और रक्त की आहुतियाँ देते थे — तंत्र पर आधारित आराधना।

• उनका उद्देश्य शीघ्र सिद्धि और भौतिक शक्तियाँ प्राप्त करना था, आत्मोन्नति नहीं।

अत: वे उस ‘ब्रह्मा’ की उपासना करते थे जो “अहंकार और वासना” का प्रतीक था — न कि सृष्टि के सम्यक् सृजनकर्ता विष्णु–कमल–ब्रह्मा त्रिदेव।

3. प्रश्न: यदि वे विष्णु को नहीं मानते, तो कमल-ब्रह्मा से वरदान कैसे?

• विष्णु के नाभिकमल पर जो ब्रह्मा जी विराजमान हैं, वे सृष्टि के नियमों के पालक हैं — वे असुरों को शक्ति देकर अपनी ही सृष्टि को क्यों नष्ट करेंगे?

• इसलिए यह संभव ही नहीं कि असुरों को वरदान विष्णु–कमल–ब्रह्मा द्वारा मिले हों।

• स्पष्ट है: असुरों के वरदाता कोई ‘दूसरे ब्रह्मा’ थे — पंचम सिर!

4. अब्राहमिक पंथों का संबंध भी इसी ‘पांचवें सिर वाले ‘ब्रह्मा’ से?

कुछ रहस्यवादी ग्रंथों में कहा गया है कि अब्राहमिक पंथों का ईश्वर वही चेतना है जो ब्रह्मा के पांचवे सिर में समाई थी।

वह ईश्वर न सृष्टि करता है, न प्रेम सिखाता है, केवल अधीनता, बलिदान और एकेश्वरवाद का आदेश देता है।

उसका आदेश — गौहत्या, मूर्तिविरोध, जिहाद, विनाश — वही मानसिकता है जो पंचम ब्रह्मा से उपजी थी।

उदाहरणों से पुष्टि:

  1. हिरण्यकश्यप – वरदान माँगता है: “ना दिन, ना रात, ना अस्त्र, ना शस्त्र…”

यह “खूबसूरती से loophole ढूंढना” — वासना और अहंकार से उपजा तर्क।

  1. रावण – ब्रह्मा से अमरत्व नहीं माँग पाया, बल्कि लंबे जीवन के लिए तपस्या।

ब्रह्मा के पंचम स्वरूप ने कोई पूर्णता नहीं दी, केवल तात्कालिक शक्तियाँ।

  1. महिषासुर – तांत्रिक उपासक, रजसिक और तामसिक बलिदानों के द्वारा शक्ति प्राप्त करता है।

निष्कर्ष:

राक्षसों को वरदान देने वाला ब्रह्मा — कोई दिव्य देव नहीं था।

वह ‘शिव द्वारा दंडित ब्रह्मा’ का कटा हुआ सिर था, जो अहंकार, अविद्या, तंत्र और विकृति का प्रतीक बन गया।

इस सत्य को जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि आज भी अनेक पंथ, सम्प्रदाय और ताकतें उसी ‘पंचम ब्रह्मा’ की ऊर्जा से संचालित हैं —

जहाँ भक्ति नहीं, सत्ता है; करुणा नहीं, खून है।
जहाँ सत्य नहीं, सिर्फ आज्ञा पालन है।

ब्रह्मा का पांचवा अहंकारी सिर और गुरु शुक्राचार्य :

महाभारत के बाद कलियुग के शुरूआती समय में दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने इसी ब्रह्मा ( अहंकारी / वासनात्मक पांचवें सिर ) की चेतना और प्रेरणा से मिस्र के पिरामिडों में मृत संजीवनी विद्या का इस्तेमाल कर , ऐसे ऐसे पंथ बनाये जो कि ‘ हलाहल ‘ विष की तरह पूरे विश्व को नष्ट करने पर उतारु हो गये है ।

  • इसका निवारण महाकाली और महाकाल के काल भैरव स्वरुप की शक्ति अराधना ही है ।

publicfirstnews.com

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