15 अगस्त: जश्न या धोखा?

15 अगस्त 1947 — जिसे हमें बचपन से “आज़ादी दिवस” कहा गया — असल में था विभाजन का काला दिन।

उस दिन हमारे देश को मज़हब के नाम पर चीर दिया गया।

लाखों लोग बेघर हुए, हज़ारों निर्दोष मारे गए, सैकड़ों महिलाओं की अस्मिता लूटी गई।

ट्रेनें लाशों से भरी आईं, नदियाँ खून से लाल हुईं — और उसी के बीच सत्ता के गलियारों में नेहरू-जिन्ना की ताजपोशी का जश्न मनाया गया।

सवाल उठते हैं:

  • अंग्रेज़ कब आए और कब गए — उनकी “भागते हुए” एक भी तस्वीर क्यों नहीं है?
  • गांधी-नेहरू अंग्रेज़ों के साथ चाय-सिगरेट पीते नज़र आए — क्या यही थी जंग-ए-आज़ादी?
  • बंगाल और पंजाब में हिंदुओं का कत्लेआम और पलायन — इस पर चुप्पी क्यों?
  • क्या 15 अगस्त सेना के शौर्य का दिन है, या नेताओं की डील का?

सच को छुपाया गया — ताकि आने वाली पीढ़ी को वही कहानी सुनाई जाए जो सत्ता को सूट करे।

आज सवाल यह है:

  • क्या 15 अगस्त “आज़ादी दिवस” है या “विभाजन शोक दिवस”?
  • अगर हम सच्चा इतिहास नहीं जानेंगे — तो खोई हुई भूमि और माँ को कैसे पाएंगे?

क्या हमने जश्न-ए-आज़ादी के नाम पर अपने ही जख्मों पर फूल चढ़ा दिये?

15 अगस्त 1947 — जिसे हमें बचपन से “स्वतंत्रता दिवस” के रूप में पढ़ाया और सिखाया गया — असल में हमारे इतिहास का सबसे बड़ा त्रासद दिन भी था। उस दिन आधिकारिक तौर पर हमारे देश को दो टुकड़ों में बाँट दिया गया — वो भी मज़हब के आधार पर।
यह वह दिन था जब लाखों लोग बेघर हुए, हज़ारों निर्दोष मारे गए, और सैकड़ों महिलाओं की अस्मिता को कुचला गया। ट्रेनें लाशों से भरी आईं, नदियाँ खून से लाल हुईं, और गाँव के गाँव खामोश हो गए।

जश्न या षड्यंत्र का आवरण?

इतने खून और आँसुओं के बीच, सवाल उठता है — हमने इसे जश्न के रूप में कैसे अपना लिया?
क्या यह संभव है कि नेहरू और जिन्ना की “ताजपोशी” को एक सुनियोजित तरीके से “जश्न-ए-आज़ादी” का नाम दे दिया गया?
इतिहास के पन्नों पर सच्चाई दबा दी गई — और आम जनता को सिर्फ वही कहानी सुनाई गई जो सत्ता में बैठे नेताओं को सुविधाजनक लगी।

अंग्रेज़ कब आए और कैसे गए?

हम बार-बार सुनते हैं कि अंग्रेज़ों ने हमें गुलाम बनाया और गांधी-नेहरू ने उन्हें भगा दिया।
पर ज़रा सोचिए — वो अंग्रेज़ भागते हुए कहाँ दिखे?
कोई ऐतिहासिक चित्र, कोई फ़ुटेज, कोई दस्तावेज़ — जो यह साबित करे कि अंग्रेज़ हमसे डरकर भागे ?
इसके बजाय, तस्वीरें दिखाती हैं कि गांधी-नेहरू अंग्रेज़ों के साथ चाय-सिगरेट पीते और मुस्कुराते हुए खड़े हैं। यह कौन सी जंग-ए-आज़ादी थी जिसमें दुश्मन और नेता साथ-साथ जश्न मना रहे थे?

सेना के शौर्य का अपमान

भारत की आज़ादी की असली लड़ाई और देश की रक्षा का बलिदान भारतीय सेना ने दिया — फिर चाहे वह 1857 की क्रांति हो, या विश्वयुद्ध में लड़ने वाले भारतीय सैनिक, या फिर सीमा पर बलिदान देने वाले जवान।
पर 15 अगस्त का उत्सव, सेना के शौर्य से कम और राजनीतिक सौदेबाज़ी से ज़्यादा जुड़ा हुआ लगता है।

बंगाल और पंजाब का दर्द

  • विभाजन के समय बंगाल और पंजाब के हिंदुओं पर जो कहर टूटा, वह आज भी पूरी तरह दर्ज नहीं हुआ।
  • बंगाल में लाखों हिंदुओं को मारा गया, मंदिर जलाए गए, और लोग निर्वासित हुए।
  • पाकिस्तान बनने के बाद, लाखों हिंदू और सिख मारे गए या भागकर भारत आए।

इन घटनाओं के बीच, नेहरू और गांधी को “स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व” करने वाला बताने वाली कथा, असल में एक अधूरी और सजाई-संवारी कहानी है।

सच्चा इतिहास या खोखली परंपरा?

अगर हमने 15 अगस्त के पीछे की सच्चाई को नहीं समझा, तो उस मिट्टी और उस माँ को फिर से कैसे पा सकेंगे जिसे हम खो चुके हैं?

शायद अब समय है कि हम सोचें —

क्या 15 अगस्त को सिर्फ़ “आज़ादी दिवस” के रूप में मनाना सही है, या फिर इसे “विभाजन शोक दिवस” के रूप में याद करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी झूठी कहानियों के बजाय असली इतिहास जान सके।

निष्कर्ष:

हमारा देश आज भी अपनी वास्तविक आज़ादी की खोज में है — वो आज़ादी, जो सच्चाई और न्याय पर आधारित हो। जब तक हम अपने अतीत की सही तस्वीर नहीं देखेंगे, तब तक भविष्य को सही दिशा नहीं दे पाएंगे।

publicfirstnews.com

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