HIGHLIGHTS FIRST :

  • विकास के नाम पर प्रकृति की हत्या
  • ⁠कौन तय करता है विकास की परिभाषा ?
  • ⁠जंगलों में कांक्रीट सड़कें हैं विकास ?
  • ⁠खेत पाटकर बिल्डिंग बना देना विकास ?
  • ⁠रोजगार सिर्फ धुआँ उगलते कारख़ाने ?
  • ⁠धुआँ उगलती गाड़ियाँ – विकास की रफ़्तार ?
  • ⁠आपकी मांग – नेता का स्वांग – ठेकेदारों के चार चाँद ।

सड़कें बन रही हैं…
कांक्रीट फैल रहा है…
पेड़ कट रहे हैं…
नदियाँ मर रही हैं…

और हमें कहा जा रहा है—
यही विकास है।

लेकिन सवाल ये है—
किसका विकास? किस कीमत पर?

क्या पब्लिक के लिए विकास का मतलब सिर्फ़
ज़मीन के ऊपर सड़क, मॉल, फैक्ट्री और बिल्डिंग है?
या फिर स्वस्थ हवा, पानी, मिट्टी और जीवन?

आज Public First पूछ रहा है वो सवाल,
जो सत्ता और सिस्टम दोनों दबाना चाहते हैं।”

क्या कांक्रीट डालना ही विकास है?

आज विकास का मतलब बना दिया गया है—
• पेड़ काटो
• नदियों को पाइप में बंद करो
• तालाब पाटो
• पहाड़ खोदो
• और ऊपर से कहो — ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’

लेकिन सच्चाई ये है कि
कांक्रीट से GDP बढ़ सकती है,
पर जीवन नहीं।

ब्यूरोक्रेसी + नेता = कंस्ट्रक्शन सिंडिकेट?

आज का सबसे बड़ा सवाल—
क्या विकास की परिभाषा
IAS फाइलों और ठेकेदारों की मीटिंग में तय होती है?
• पर्यावरण क्लियरेंस—आँख बंद करके
• जन सुनवाई—कागज़ों में
• आपत्ति—फाइल में दफन

और जनता को बताया जाता है—
“आप विकास विरोधी हैं।”

पब्लिक ज़मीन और जल तत्व से क्यों कटती जा रही है?

जहाँ कभी—
• मिट्टी थी
• कुआँ था
• पेड़ थे
• खुला आकाश था

आज वहाँ—
• पार्किंग है
• सीवेज लाइन है
• सीमेंट है
• और दम घोंटती हवा है

क्या यही “स्मार्ट सिटी” है
या स्मार्ट लूट मॉडल?

तो पब्लिक के लिए विकास क्या होना चाहिए?

पब्लिक के लिए विकास मतलब—

✔ स्वच्छ हवा
✔ ज़िंदा नदियाँ
✔ सुरक्षित भूजल
✔ खेती योग्य मिट्टी
✔ पैदल चलने लायक शहर
✔ बच्चों के लिए पेड़, न कि सिर्फ़ फ्लाईओवर

विकास वो नहीं जो ऊपर दिखे,
विकास वो है जो भीतर जीवन बचाए।

क्यों चुप है सिस्टम?

क्योंकि—
• कांक्रीट में कमीशन है
• पेड़ में नहीं
• फ्लाईओवर में फोटो है
• तालाब में नहीं

इसलिए प्रकृति मर रही है
और सिस्टम तालियाँ बजा रहा है।

“अब वक्त आ गया है पूछने का—
क्या हम नागरिक हैं
या सिर्फ़ डिस्टर्बेंस इन फाइल्स?

अगर विकास
माँ प्रकृति को मारकर हो
तो वो विकास नहीं,
धीमा नरसंहार है।

विकास का भ्रम: जब जनता से मांग करवाई जाती है अपने ही जीवन के सौदे की

आज भारत में “विकास” शब्द जितना बोला जा रहा है, उतना ही वह अपने मूल अर्थ से दूर होता जा रहा है। जनता से कहा जाता है—विकास की मांग करो। लेकिन यह नहीं बताया जाता कि किस प्रकार का विकास, किसके लिये और किस कीमत पर।
धीरे-धीरे यह प्रक्रिया एक ऐसे भ्रम में बदल जाती है, जहाँ जनता अनजाने में अपने ही स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता का सौदा कर बैठती है।

मांग का प्रबंधन: जरूरत नहीं, परिणाम पूछो

आधुनिक नीति-निर्माण का एक खतरनाक चलन है—
समस्या की जड़ पर बात न करके, उसके परिणाम को “विकास” कह देना।

उदाहरण के तौर पर:
• जनता से स्वस्थ जीवनशैली की मांग नहीं करवाई जाती
• बल्कि अस्पतालों की मांग करवाई जाती है

अस्पताल अपने-आप में समाधान नहीं हैं। वे इस बात के संकेत हैं कि समाज बीमार है।
फिर भी कंक्रीट की बड़ी इमारतें, मेडिकल वेस्ट, महंगी दवाइयाँ और उपकरणों का व्यापार—इन सबको “स्वास्थ्य विकास” का नाम दे दिया जाता है।

असल विकास वह है जहाँ लोग कम बीमार पड़ें।
लेकिन जब बीमारियाँ ही व्यापार बन जाएँ, तो इलाज एक स्थायी उद्योग बन जाता है।

विरोधाभास को नीति बना देना

आज कई सरकारी योजनाएँ अपने ही उद्देश्य का विरोध करती दिखती हैं।
• शराब की बिक्री से राजस्व बढ़ाया जाता है
→ फिर नशा मुक्ति अभियान चलाया जाता है
• प्राइवेट स्कूल और कॉलेज खोले जाते हैं
→ फिर “समान शिक्षा” का दावा किया जाता है
• निजी अस्पतालों को बढ़ावा दिया जाता है
→ फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी पर चिंता जताई जाती है

यह व्यवस्था समस्या को खत्म नहीं करती, बल्कि उसे नियंत्रित करके चलाती है।
समस्या बनी रहे—तभी योजना, बजट और प्रचार चलता रहेगा।

इलाज अगर ज़रूरी है, तो निजी क्यों?

एक बुनियादी सवाल अक्सर अनसुना कर दिया जाता है:

अगर इलाज जीवन की मूल आवश्यकता है, तो उसे निजी हाथों में क्यों छोड़ा गया?
• अच्छे डॉक्टर निजी अस्पतालों में हैं
• सरकारी अस्पतालों में स्टाफ़ और संसाधनों की कमी है
• निजी स्कूलों और कॉलेजों को कीमती ज़मीनें मिलती हैं
• सरकारी संस्थानों में योग्य शिक्षकों का अभाव बताया जाता है

फिर निष्कर्ष दिया जाता है—
“सरकारी व्यवस्था असफल है।”

जबकि असलियत यह है कि व्यवस्था को जानबूझकर कमजोर किया गया, ताकि निजी मॉडल को अनिवार्य बनाया जा सके।

विदेशी मॉडल और भारतीय ज़मीनी सच्चाई

अक्सर अधिकारी और नीति-निर्माता विदेशों में “विकास” का पाठ पढ़कर आते हैं।
लेकिन कोई यह नहीं पूछता:
• वहाँ क्या सीखा गया?
• वह मॉडल भारत के गाँव, किसान और सामाजिक ढांचे पर कैसे लागू होगा?

यूरोप और भारत की परिस्थितियाँ अलग हैं—
जलवायु, जनसंख्या, संसाधन और जीवन-शैली सब कुछ भिन्न।

फिर भी बिना स्थानीय संदर्भ समझे, वही मॉडल भारतीय गाँवों पर थोप दिया जाता है।
परिणाम—नीतियाँ काग़ज़ पर सुंदर, ज़मीन पर असफल।

विकास की असली परिभाषा

विकास वह नहीं है जो केवल GDP या इमारतों में दिखे।
विकास वह है जहाँ:
• लोग स्वस्थ हों
• शिक्षा सुलभ और समान हो
• इलाज बोझ न बने
• और राज्य अपनी मूल जिम्मेदारियों से पीछे न हटे

जब जनता से भ्रमित मांग करवाई जाती है,
तो वह अनजाने में अपने ही जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य का सौदा कर बैठती है।

निष्कर्ष

आज ज़रूरत इस बात की है कि
जनता “विकास” के नारों से आगे जाकर यह पूछे:

यह विकास किसके लिये है?
और इसकी कीमत कौन चुका रहा है?

क्योंकि जो विकास जीवन को बेहतर न बनाए,
वह सिर्फ़ एक व्यवस्थित व्यापार है—जनहित नहीं।

Public First
सत्ता से नहीं,
सत्य से चलता है।”

PUBLICFIRSTNEWS.COM

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