जम्मू-कश्मीर से सामने आ रही खबरें बेहद चिंताजनक और झकझोर देने वाली हैं। बीते एक दशक में बिजली करंट से जुड़े हादसों में लगभग 400 बिजली कर्मचारियों की जान जा चुकी है, जबकि सैकड़ों युवा स्थायी रूप से विकलांग हो गए हैं। ये आंकड़े न सिर्फ बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि पूरे सुरक्षा तंत्र की गंभीर विफलता को भी उजागर करते हैं।

जानकारी के अनुसार, सबसे ज्यादा प्रभावित वे कर्मचारी हैं जो अस्थायी, कॉन्ट्रैक्ट या डेली वेज पर काम कर रहे हैं। इन कर्मचारियों को न तो पर्याप्त सुरक्षा उपकरण मुहैया कराए जाते हैं और न ही उन्हें आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाता है। कई मामलों में उन्हें असुरक्षित माहौल और पुराने उपकरणों के साथ काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे हादसों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

इन दुर्घटनाओं का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि अनेक युवा कर्मचारियों ने अपने हाथ या पैर गंवा दिए हैं। एक पल की लापरवाही या व्यवस्था की चूक ने उनका पूरा जीवन बदल दिया। शारीरिक विकलांगता के साथ-साथ ये कर्मचारी और उनके परिवार आर्थिक व मानसिक संकट से जूझ रहे हैं। घर का कमाने वाला सदस्य अपाहिज हो जाने से परिवारों की हालत बद से बदतर होती जा रही है।

कई मामलों में पीड़ित परिवारों को न तो समय पर मुआवजा मिला और न ही स्थायी रोजगार का भरोसा। इससे सरकारी संवेदनशीलता पर भी सवाल उठने लगे हैं। कर्मचारी यूनियनों और सामाजिक संगठनों ने इन घटनाओं को लेकर गहरी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि अगर समय रहते सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू किया जाता, तो सैकड़ों जानें बचाई जा सकती थीं।

यूनियनों ने सरकार से मांग की है कि

  • सभी कर्मचारियों को मानक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं
  • नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाएं
  • हादसों में प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और स्थायी नौकरी दी जाए
  • अस्थायी कर्मचारियों की सेवा शर्तों में सुधार किया जाए

अंत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इन मर्मांतक हादसों से सबक लेकर ठोस और प्रभावी कदम उठाएगी? या फिर ये घटनाएं केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाएंगी।

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