भारत ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परचम लहराया है। अमेरिका के कोलोराडो राज्य के ब्रेकेनरिज में आयोजित प्रतिष्ठित इंटरनेशनल स्नो स्कल्पचर चैंपियनशिप 2026 में टीम स्नो इंडिया ने अपनी अनोखी और विचारोत्तेजक रचना “कॉर्न: द अल्टीमेट डोमेस्टिकेटर” के लिए ब्रॉन्ज़ मेडल के साथ-साथ पीपल्स चॉइस अवॉर्ड भी अपने नाम किया है।

इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में दुनिया भर से आई टीमों के बीच भारत की यह उपलब्धि खास मानी जा रही है। चार सदस्यीय टीम — ज़हूर कश्मीरी, मृदुल उपाध्याय, सुहैल मोहम्मद खान और मैट सीली (USA) — ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में यह कारनामा किया। कलाकारों ने -31 डिग्री सेल्सियस के कड़ाके की ठंड में, चार दिनों तक लगातार मेहनत करते हुए 25 टन वज़न और 12 फुट ऊंचे बर्फ के ब्लॉक से यह विशाल कलाकृति तैयार की।

चैंपियनशिप के नियमों के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी तरह के पावर टूल या आंतरिक सपोर्ट का उपयोग वर्जित था। टीम ने केवल हाथ के औज़ार, शारीरिक क्षमता, हुनर और कल्पनाशक्ति के बल पर इस स्कल्पचर को आकार दिया, जो अपने आप में उनकी तकनीकी दक्षता और समर्पण को दर्शाता है।

इस वर्ष की थीम के अंतर्गत तैयार की गई 16 फुट ऊंची कलाकृति, “कॉर्न: द अल्टीमेट डोमेस्टिकेटर — हू इज़ ट्रूली इन कंट्रोल?”, प्रसिद्ध लेखक युवल नोआ हरारी की पुस्तक ‘सेपियंस’ से प्रेरित है।

हास्य और गंभीरता के संतुलन के साथ प्रस्तुत यह स्कल्पचर दर्शकों को प्रकृति और मानव सभ्यता के रिश्ते पर सोचने के लिए मजबूर करता है। यही वजह रही कि यह कलाकृति न सिर्फ़ जजों को प्रभावित करने में सफल रही, बल्कि पब्लिक वोटिंग में भी सबसे ज़्यादा पसंद की गई।

प्रतियोगिता में कोरिया ने गोल्ड, मंगोलिया ने सिल्वर, जबकि भारत ने ब्रॉन्ज़ मेडल हासिल किया। इसके साथ ही पीपल्स चॉइस अवॉर्ड जीतकर टीम स्नो इंडिया ने यह साबित कर दिया कि उनकी कला तकनीकी ही नहीं, भावनात्मक रूप से भी लोगों से जुड़ती है।

यह उपलब्धि टीम स्नो इंडिया का लगातार दूसरा अंतरराष्ट्रीय पदक है। साउथ एशिया की पहली स्नो स्कल्पटिंग टीम के रूप में, टीम ने सीमित संसाधनों के बावजूद वैश्विक मंच पर भारत की मौजूदगी को मज़बूती से दर्ज कराया है।

टीम सदस्यों ने आयोजकों का धन्यवाद करते हुए भारत सरकार और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर से संस्थागत सहयोग और समर्थन की अपील दोहराई है। उनका मानना है कि उचित प्रोत्साहन और संसाधन मिलने पर भारत न केवल स्नो स्कल्पटिंग, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में स्नो आर्ट और विंटर टूरिज्म के एक नए सांस्कृतिक आंदोलन का नेतृत्व कर सकता है।

टीम स्नो इंडिया की यह सफलता न सिर्फ़ एक पदक है, बल्कि यह भारत की कल्पनाशीलता, सांस्कृतिक सोच और वैश्विक रचनात्मक पहचान का प्रतीक बनकर सामने आई है।

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