उत्तर-पश्चिम भारत का सबसे प्राचीन भूगर्भीय कवच—आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के उस फैसले ने, जिसमें सिर्फ 100 मीटर से ऊँची पहाड़ियों को ही ‘अरावली’ मानने का मानदंड तय किया गया, पर्यावरणविदों के बीच खतरे की घंटी बजा दी है। यह तकनीकी परिभाषा नहीं, पर्यावरणीय आत्मघात है—जिससे राजस्थान की लगभग 90% अरावली पहाड़ियाँ खनन के लिए खुल जाएँगी और दिल्ली–एनसीआर का इकोसिस्टम सीधे निशाने पर आ जाएगा।

  • फैसले की पृष्ठभूमि: संरक्षण से ढील तक का सफ़र

2002 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में खनन पर सख्त रोक लगाई थी। इसके बावजूद अवैध खनन फलता-फूलता रहा। सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि 1967 से अब तक 25% अरावली नष्ट हो चुकी है।
9 मई 2024 को केंद्र ने एक समिति बनाई—और उसी की सिफारिश पर नवंबर 2025 में कोर्ट ने 100 मीटर की ऊँचाई को कसौटी बना दिया।

परिणाम?
• ढलान और बफर ज़ोन जैसी समग्र पर्यावरणीय समझ हट गई।
• नए खनन पट्टों पर औपचारिक रोक, लेकिन मौजूदा ‘वैध’ खनन को जारी रखने की छूट—यानी दरवाज़ा बंद दिखा, खिड़की खुली।

  • विनाश के ठोस तथ्य: आँकड़े जो डराते हैं • 90% पहाड़ियाँ असुरक्षित: 100 मीटर से नीचे की अधिकांश अरावली अब Forest Conservation Act के दायरे से बाहर।
    • 31 पहाड़ियाँ गायब: फॉरेस्ट सर्वे रिपोर्ट्स में खनन माफिया की सक्रियता दर्ज।
    • जल संकट: भूजल स्तर धड़ाम—अरावली वर्षा जल का प्राकृतिक स्पंज है; इसके टूटते ही अलवर से गुरुग्राम तक कुएँ सूखेंगे।
    • वायु प्रदूषण: स्टोन क्रशर की धूल—दिल्ली की सांसें और भारी होंगी।
    • जैव विविधता हानि: तेंदुआ, नीलगाय, सरीसृप—सब विस्थापन की कगार पर।
    • रेगिस्तान का विस्तार: थार की रेत दिल्ली के दरवाज़े तक।
  • प्रभावित क्षेत्र:

राजस्थान (अलवर, जयपुर, सीकर, दौसा, भरतपुर)

हरियाणा (महेंद्रगढ़, नूंह, गुरुग्राम), गुजरात तक—100 से अधिक गाँव सीधी मार में।

  • सरकारों की चुप्पी ??

केंद्र का ‘अरावली ग्रीन वॉल’ (जून 2025)—काग़ज़ों में हरा, ज़मीन पर कमजोर।
राजस्थान सरकार 2010 से 100 मीटर परिभाषा पर चल रही थी—अब उसे राष्ट्रीय वैधता मिल गई।
मीडिया कवरेज हुई, बहस भी—पर जवाबदेही?
• खनन माफिया के नाम?
• किन मंत्रियों/अधिकारियों की मिलीभगत?
• किन कंपनियों को फायदा?
इन सवालों पर खामोशी।

  • असली सवाल: क्या यह विकास है?

जब पानी सूखे, हवा ज़हर बने, जंगल मिटें, और शहर रेगिस्तान की ओर बढ़े—तो इसे विकास नहीं, नीतिगत अपराध कहा जाएगा।
वरिष्ठ नेता इसे ‘डेथ वारंट’ कह चुके हैं—और सच यह है कि इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।

बचाव के उपाय: अभी नहीं तो कभी नहीं

  • नागरिक क्या करें : • सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड कराएँ।
    • RTI से खनन पट्टों, पर्यावरण स्वीकृतियों और निगरानी रिपोर्ट्स मांगें।
    • प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति को ज्ञापन—जनदबाव बनाएं।
  • संगठन क्या करें : • रिव्यू पिटीशन या नई PIL।
    • वैज्ञानिक मैपिंग (ड्रोन/GIS) से वास्तविक अरावली सीमा तय कराने की मांग।

सरकार से स्पष्ट मांग:


• पूर्ण खनन प्रतिबंध (वैध–अवैध दोनों)।
• क्रिटिकल इको-सेंसिटिव ज़ोन की अधिसूचना।
• निर्माण के लिए वैकल्पिक सामग्री को बढ़ावा।

  • पब्लिक फर्स्ट की अपील

अरावली बचाओ—वरना दिल्ली रेगिस्तान बनेगा।

यह लड़ाई पहाड़ों की नहीं, हमारी सांसों, पानी और आने वाली पीढ़ियों की है।

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