विकास के नाम पर चल रही सबसे बड़ी धोखाधड़ी
क्या विकास का मतलब
चौड़ी डामर की सड़कें,
ऊँची सीमेंट की इमारतें,
और तेज़ भागती गाड़ियाँ ही रह गया है?
अगर यही विकास है —
तो ज़रा रुककर एक सवाल पूछिए
इस रफ्तार पर बैठकर हम आख़िर जा कहाँ रहे हैं?
पेड़ काटकर, नदियाँ पाटकर कौन-सा विकास?
हम जिस विकास पर तालियाँ बजा रहे हैं,
वो दरअसल हमारे ही विनाश की पटकथा है।
पेड़ काटे जा रहे हैं,
नदियाँ–तालाब मिटाए जा रहे हैं,
पहाड़ खोदे जा रहे हैं —
और ऊपर से कहा जा रहा है:
“देश तरक्की कर रहा है।”
पर सच यह है
यह विकास जनता का नहीं है।
ये विकास किसका है?
सीमेंट कंपनियों का
सड़क ठेकेदारों का
उन अफ़सरों का जो योजनाएँ बनाते हैं
उन नेताओं का जो मौन स्वीकृति देते हैं — अपना हिस्सा लेकर
और फिर कहा जाता है:
“ये तो पब्लिक की मांग है।”
क्या सच में?
घर हैं, लोग नहीं
आज घरों में कमरे हैं,
लेकिन घर में रहने वाले लोग नहीं।
6–7–8 सीटर गाड़ियाँ हैं,
लेकिन सफ़र अकेले हो रहा है।
हमने सबको पीछे छोड़ने की दौड़ में —
अपने लोग, अपना समय, अपनी शांति
सब पीछे छोड़ दिया।
प्रकृति उजाड़ो, फिर उसी को देखने जाओ
हम प्रकृति नष्ट करते हैं,
फिर राहत पाने के लिए पर्यटन पर जाते हैं।
और वहाँ भी
होटल
सड़क
प्लास्टिक
कंक्रीट का जाल
जहाँ शांति चाहिए थी,
वहाँ भी शोर पहुँचा दिया।
हम दौड़ रहे हैं… लेकिन क्यों?
हम सबसे तेज़ दौड़ रहे हैं।
पर किसी को नहीं पता
जल्दी पहुँचकर करना क्या है?
इस अंधी दौड़ में
हमारा स्वास्थ्य,
हमारे रिश्ते,
हमारी धरती
सब छूटते जा रहे हैं।
ये विकास नहीं — सृष्टि का विनाश है
और सबसे बड़ा सच
यह सब हमारे ही टैक्स के पैसे से हो रहा है।
कोई नेता, कोई अफ़सर
अपनी जेब से कुछ नहीं लगा रहा।
हमारा पैसा —
हमारे ही विनाश पर खर्च किया जा रहा है।
हमें वाक़ई कितना चाहिए?
अगर ईमानदारी से सोचें
हमें उतनी ज़रूरत है ही नहीं
जितनी हमें भ्रमित करके बताई गई है।
तो सवाल उठता है
शिक्षा निःशुल्क क्यों नहीं?
स्वास्थ्य निःशुल्क क्यों नहीं?
अरबों रुपये
सड़कों, इमारतों, प्रदूषणकारी गाड़ियों पर
खर्च करने से बेहतर —
इंसान पर क्यों नहीं?
अब नहीं रुके तो देर हो जाएगी
अगर अब भी हम नहीं रुके,
अगर अब भी
अफ़सर–कारोबारी–नेता गठजोड़ के खिलाफ
आवाज़ नहीं उठाई —
तो यह धरती
एक तपता हुआ सूरज का गोला बन जाएगी।
और तब कोई विकास
हमें हमारे विनाश से नहीं बचा पाएगा।
ठहरना कमजोरी नहीं है
ठहरना मतलब
सोचने की ताक़त
चुनने की आज़ादी
इंसान बने रहने की जिद
अब फैसला हमें करना है —
- शिक्षा – स्वास्थ्य सबका समान – पूरी तरह निःशुल्क किया जाये ।
- प्रदूषण रहित पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम दो – ना की धूंआ छोड़ती गाड़ियाँ और उससे ट्रैफ़िक जाम और एक्सीडेंट ।
- ये करवा लिया तो आप इतने में ही आप इन धूर्तों के लिये कमाना बंद कर देंगे।
- तो ना ये अमीर दिखेंगे और फिर ना हम गरीब या मिडिल क्लास ।
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