हमारी ओर से शुरू की गई जन-अभियान के तहत एक अहम सवाल जनता के सामने रखा गया है:
क्या विकास का मतलब केवल बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण, सड़कों पर डामर बिछाना और बेहिसाब कंक्रीट का इस्तेमाल है, या फिर पर्यावरण की रक्षा के साथ एक स्वस्थ और टिकाऊ जीवन जीना ही असली विकास है?


अभियान के दौरान जन-सरोकार से जुड़े हलकों में इस सवाल पर गंभीर चर्चा देखने को मिल रही है। नागरिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों की बेधड़क तबाही न सिर्फ आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरा है, बल्कि वर्तमान समय में भी मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है।


पेड़ों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण और कृषि भूमि पर कंक्रीट का फैलाव

पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ चुका है।
हमारा मानना है कि असली विकास वही है
जो इंसान और प्रकृति के बीच संतुलन कायम रखे।


जनता के अनुसार विकास परियोजनाएं इस तरह से होनी चाहिए कि रोज़गार के अवसर भी पैदा हों और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे, ताकि लोगों को स्वच्छ हवा, स्वच्छ पानी और बेहतर स्वास्थ्य मिल सके।

अभियान को बड़ी संख्या में लोगों ने सराहा है और कहा है कि अब समय आ गया है कि विकास की पारंपरिक सोच पर पुनर्विचार किया जाए। नागरिकों का कहना है कि अगर विकास के बदले बीमारी, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाएं मिलें, तो ऐसी तरक्की का कोई मतलब नहीं।


हमारा यह अभियान न सिर्फ एक सवाल उठा रहा है, बल्कि नीति-निर्माताओं, प्रशासन और आम जनता—सभी को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि भविष्य के विकास का रास्ता क्या होना चाहिए—कंक्रीट का जंगल या प्रकृति के साथ सामंजस्य में एक स्वस्थ समाज۔

PUBLICFIRSTNEWS.COM

Share.
Leave A Reply