HIGHLIGHTS FIRST :
- पुराणिक कथा, ऐतिहासिक विकास और दार्शनिक सीमा की तथ्यपरक विवेचना
अनंत शिव के ज्योतिर्लिंग (तेजोमय स्तंभ) स्वरूप की कथा मुख्यतः शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता) में वर्णित है।
शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता) के अनुसार:
• ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता विवाद हुआ
• तभी शिव ने स्वयं को अनंत ज्योति स्तंभ (प्रकाश का स्तंभ) के रूप में प्रकट किया
• उस ज्योति का:
• न ऊपर कोई अंत था
• न नीचे कोई मूल
• न उसका कोई स्थान था
• ब्रह्मा ऊपर गए, विष्णु नीचे —
दोनों असफल रहे
यह ऐतिहासिक घटना नहीं,
बल्कि पुराणिक प्रतीकात्मक कथा है
यही कथा लिंग पुराण और स्कंद पुराण में भी समान रूप से मिलती है।
दार्शनिक अर्थ
यह ज्योति:
• किसी पत्थर का लिंग नहीं थी
• किसी मंदिर में स्थित मूर्ति नहीं थी
• बल्कि अनंत, स्थानातीत, कालातीत तेज थी
अर्थात यह निर्गुण शिव का संकेत था —
जिसे न देवता जान सके, न माप सके।
ज्योतिर्लिंग “उत्पत्ति” नहीं — प्राकट्य है
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि:
• ज्योतिर्लिंग का कोई जन्म या निर्माण नहीं बताया गया
• पुराणों में शब्द आता है — “स्वयंभू”
स्वयंभू का अर्थ:
• मनुष्य द्वारा स्थापित नहीं
• किसी काल में गढ़ा नहीं
• प्रतीकात्मक रूप से “स्वतः प्रकट”
इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि:
शिव को किसी ने बनाया नहीं,
केवल संकेत रूप में अनुभव किया।
ज्योतिर्लिंग से पहले शिव-आराधना कैसे होती थी?
वैदिक काल (ऋग्वेद)
• शिव को रुद्र कहा गया
• पूजा यज्ञ–मंत्रों से होती थी
• कोई मूर्ति या लिंग-स्थापना नहीं
उत्तर वैदिक / पुराणिक संक्रमण
• दक्ष यज्ञ कथा (लिंग पुराण) के बाद
• पार्थिव / प्राकृतिक लिंग पूजा का प्रचलन
• नदियों (विशेषकर नर्मदा) से स्वाभाविक पत्थर लिंग लाने की परंपरा
पुरातात्विक संकेत
• सिंधु घाटी सभ्यता से प्रोटो-शिव प्रतीक
• योगमुद्रा, पशुपति आकृति
यह ऐतिहासिक है, पर इसे सीधे ज्योतिर्लिंग नहीं कहा जा सकता
“12 ज्योतिर्लिंग” की संख्या कैसे बनी?
पुराणिक स्थिति
शिव पुराण में 12 ज्योतिर्लिंगों की सूची मिलती है:
• सोमनाथ
• मल्लिकार्जुन
• महाकाल
• ओंकारेश्वर
• केदारनाथ
• भीमाशंकर
• काशी विश्वनाथ
• त्र्यंबकेश्वर
• वैद्यनाथ
• नागेश्वर
• रामेश्वरम
• घृष्णेश्वर
प्रत्येक की अलग पौराणिक कथा है:
• सोमनाथ → चंद्र तप
• रामेश्वरम → राम द्वारा स्थापना
• केदारनाथ → पांडव कथा
कोई ऐतिहासिक तिथि, शासक या व्यक्ति नहीं जिसने “12” तय किए हों
मंदिर कब बने? (इतिहास)
यहाँ स्पष्ट भेद ज़रूरी है:
• ज्योतिर्लिंग = पुराणिक/दार्शनिक अवधारणा
• मंदिर = ऐतिहासिक निर्माण
अधिकांश वर्तमान ज्योतिर्लिंग मंदिर:
• 11वीं से 18वीं शताब्दी के बीच बने
• राजाओं, भक्ति आंदोलन और क्षेत्रीय संरक्षण से
• कई बार नष्ट–पुनर्निर्मित हुए
इसलिए यह कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं कि
“12 ज्योतिर्लिंग एक साथ किसी युग में स्थापित हुए”
क्या अनंत शिव वास्तव में 12 स्थानों तक सीमित हो सकते हैं?
पुराण स्वयं कहते हैं — नहीं।
• शिव निर्गुण–निराकार हैं
• स्थान में सीमित नहीं
• काल में बंधे नहीं
12 ज्योतिर्लिंगों को अनंत शिव का पूर्ण स्वरूप मान लेना
दार्शनिक रूप से सही नहीं।
सही समझ यह है:
• ये संकेत स्थल हैं
• सांस्कृतिक और भक्ति-केंद्र हैं
• अनंत शिव के मानवीय अनुभव बिंदु हैं
शिव पाषाण में हैं या नहीं?
ग्रंथीय दृष्टि से:
• शिव पाषाण नहीं
• पाषाण प्रतीक है
ज्योतिर्लिंग:
• स्वयंभू पत्थर माने जाते हैं
• पर शिव चेतना उसमें “बसी” नहीं,
बल्कि उसके माध्यम से संकेतित होती है
अभिषेक परंपरा का तथ्य
ग्रंथीय आधार
• शिवधर्म शास्त्र
• रुद्र यामल
• पुराणिक विधियाँ
अभिषेक:
• जल, दूध, दही, घी, मधु, बिल्वपत्र
• शुद्धिकरण और समर्पण का प्रतीक
यह अनिवार्य नहीं,
यह शिव को प्रसन्न करने की शर्त नहीं
यह भक्ति की भाषा है,
न कि शिव-तत्त्व की आवश्यकता।
समेकित निष्कर्ष (तथ्यपरक)
• अनंत शिव का ज्योतिर्लिंग स्वरूप पुराणिक प्रतीक है
• वह महाकाल–महाकाली के निर्गुण तेज का संकेत है
• 12 ज्योतिर्लिंग:
• अनंत शिव की सीमा नहीं
• बल्कि मानवीय स्मृति और भक्ति के केंद्र हैं
• मंदिर और अभिषेक ऐतिहासिक–सांस्कृतिक विकास हैं
• शिव स्वयं स्थान, पत्थर और विधि से परे हैं
जो इन्हें अंतिम सत्य माने — वह प्रतीक में रुक जाएगा
जो इन्हें संकेत माने — वह अनंत की ओर खुलेगा
नोट : इसीलिये जो शिवलिंग को लेकर अनर्गल टिप्पणी करते हैं तो उन्हे सनातनी हिन्दू ये जवाब दे सकते हैं कि ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग वो अनंत निराकार शिव नहीं जो कि असल सत्य है -कोई लिंग या मूर्ति या रुप नहीं ।
- शिव वो है जिनका स्वरुप तो स्वयं ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं जान सके थे ।
- कालांतर में कर्मकांड और पुरोहितों ने जो दूध दही जल अर्पण बताया है वो स्वयं सोचिये
क्या अनंत को कुछ अर्पित किया जा सकता है ?? - क्या सत्य शिव ने अपनी पसंद बताई या अहंकार का नाश किया ??
- असत्य का नाश करें , आडंबर और कथा माया को सत्य मानना सबसे बड़ा भ्रमजाल है
- और हाँ – शिव महाकाल और उनके प्रकाश यानि महाकाली के समान कोई और नही – ना ही ब्रह्मा और ना ही विष्णु- क्योंकि शिव भेद नहीं करते ।
- शिव सबमें है – हम सब उन्हीं की अंश चेतना हैं ।
- कुछ करने से / मंत्र / तंत्र / यंत्र से नहीं बल्कि स्वयं को पहचानने का बोध है – शिव ।
- शिवोऽम = सोहऽम
कानूनी एवं वैचारिक अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख किसी धर्म, संप्रदाय, आस्था, मंदिर या धार्मिक परंपरा के विरुद्ध घृणा, अपमान या अवमानना का उद्देश्य नहीं रखता।
यह एक शैक्षिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक विवेचना है, जो प्राचीन ग्रंथों, पुराणों और इतिहास के आधार पर आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती है।
लेखक सभी नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता, आस्था के अधिकार और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करता है।
पाठक की सहमति या असहमति उसका व्यक्तिगत अधिकार है।
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