HIGHLIGHTS FIRST :
- अवतार का जाल और हिन्दू चेतना
- कथा-माया में फँसा सनातन
- अवतार बचाते रहे हिन्दू सिमटते रहे
- अवतार आये लेकिन हिन्दू घटते गये !!
- 9 अवतार बाद भी हिन्दू क्यों सिमटे?
भारतीय दर्शन में यदि किसी तत्त्व को परम सत्य कहा गया है, तो वह है शिव—
जो जन्म-मृत्यु से परे हैं,
जो काल, कर्म और देह से परे हैं,
जो किसी कथा, घोषणा या प्रमाण के मोहताज नहीं।
इसके विपरीत, पुराणिक परंपरा में एक लंबी श्रृंखला दिखाई देती है—
अवतारों की श्रृंखला—
जहाँ बार-बार यह कहा जाता है:
“जब-जब अधर्म बढ़ेगा, मैं अवतार लूँगा।”
यहीं से प्रश्न आरम्भ होता है।
1) यदि शिव परम सत्य हैं, तो अधर्म बार-बार कैसे?
यदि शिव आदि, अनंत और साक्षात सत्य हैं, तो
• अधर्म का बार-बार खड़ा होना क्या संकेत देता है?
• क्या अधर्म किसी बाहरी शक्ति से आता है, या उसी व्यवस्था के भीतर से उपजता है?
यदि अधर्म हर युग में लौट आता है,
तो क्या यह मान लेना उचित नहीं कि समस्या की जड़ अब भी बनी हुई है?
2) ब्रह्मा–विष्णु और सत्य की सीमा (प्रतीकात्मक कथा)
पुराणों की केंद्रीय कथा—अग्निलिंग—बताती है कि
ब्रह्मा ऊपर की ओर गए,
विष्णु नीचे की ओर गए,
पर अनंत सत्य का न आदि मिला, न अंत।
विष्णु की नाभिकमल से जुड़े यानी विष्णु के निर्देशों पर रचना करने वाले वेद रचयिता ब्रह्मा ने पहला असत्य बोला – ‘ मैं सत्य को जान गया ‘ । जबकि दोनों ही परम सत्य को नहीं जान सके थे ।
सवाल ये भी कि फिर पूर्ण सत्य को स्वयं ही नहीं जान पाने वाले ब्रह्मा जी द्वारा रचित वेदों में क्या फिर पूर्ण सत्य लिखा होगा ?? तो वेदांग ज्योतिष क्या पूर्ण सत्य की गणना कर सकता है ????
दार्शनिक संकेत स्पष्ट है:
जो स्वयं परम सत्य की सीमाओं को नहीं जान सके,
वे स्वयं को परम सत्य कैसे घोषित कर सकते हैं?
3) अवतारों की पुनरावृत्ति: समाधान या स्वीकारोक्ति?
यदि अवतार स्थायी समाधान होते, तो
• दूसरा अवतार क्यों?
• तीसरा क्यों?
• और भविष्य का “अंतिम” अवतार क्यों?
बार-बार अवतार लेना क्या यह स्वीकार नहीं कि—
अधर्म समाप्त नहीं हुआ?
4) अधर्म आता कहाँ से?
यहीं सबसे कठिन प्रश्न खड़ा होता है।
पुराणों की जय-विजय कथा में बताया गया कि—
• वे विष्णु के ही द्वारपाल थे,
• शापवश पृथ्वी पर राक्षस रूप में आए,
• और बने: हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण-कुंभकर्ण, शिशुपाल, दंतवक्र।
प्रश्न यह नहीं कि वे “राक्षस” थे या नहीं;
प्रश्न यह है कि—
क्या अधर्म की उत्पत्ति स्वयं उसी दैवी व्यवस्था के भीतर से नहीं दिखाई देती?
5) क्या यह पहले से रचा गया कथानक नहीं?
हर अवतार कथा में एक समान ढाँचा दिखता है:
1. “असुर” का उभार
2. जन-पीड़ा
3. अवतार का आगमन
4. घोषणा—“मैं ही परमेश्वर हूँ।”
यदि विरोधी भी उसी व्यवस्था के भीतर से आते हों,
तो क्या यह पूर्व-निर्धारित कथानक नहीं?
6) शिव बनाम अवतार: मौन बनाम घोषणा
शिव कभी यह नहीं कहते—
“मैं परमेश्वर हूँ”, “मुझे मानो”, “मैं आया हूँ।”
शिव मौन हैं—स्थिति हैं, भूमिका नहीं।
अवतार कथा में, इसके विपरीत, घोषणा आवश्यक है।
और जहाँ घोषणा आवश्यक हो, वहाँ कहीं न कहीं असुरक्षा छिपी होती है।
7) अवतारवाद और माया
यह लेख किसी आस्था का खंडन नहीं करता।
यह केवल यह दिखाता है कि अवतारवाद एक मायिक संरचना है—
जो चेतना को बाहरी उद्धार में उलझाए रखती है।
जब तक चेतना कहती रहे—
“कोई आएगा और मुझे बचाएगा”,
तब तक वह स्वयं को अपूर्ण मानती रहेगी।
8) सबसे आवश्यक प्रश्न
यदि विष्णु परमेश्वर हैं, तो—
• बार-बार अवतार के बाद भी अधर्म क्यों लौटता है?
• हर युग में वही युद्ध, वही भय, वही पीड़ा क्यों?
और यदि उत्तर है—“यह लीला है”,
तो क्या आम मानव की पीड़ा भी केवल कथा का पात्र है?
9) निष्कर्ष: शिव-सत्य और आत्मबोध
शिव किसी कथा के नायक नहीं।
शिव वह सत्य हैं जहाँ—
न धर्म-अधर्म का द्वंद्व,
न अवतार की आवश्यकता,
न शत्रु की रचना।
अवतार कथाएँ आती-जाती रहेंगी;
परम सत्य मौन में ही रहेगा।
यह लेख कहता है—
प्रश्न करो।
क्योंकि जहाँ प्रश्न मरता है, वहीं माया जीतती है।
सनातनी हिन्दुओं के लिये अंतिम आह्वान (विशेष अनुच्छेद)
हिन्दुओ, सावधान हो जाओ।
शिव मंदिर में सीमित नहीं हैं, न ही ज्योतिर्लिंग में और ना किसी स्थान या पाषाण ( पत्थर ) में ।
वह अनंत प्रकाश, वह अग्नि-तत्त्व तुम्हारे भीतर ही है।
जिसे जल से बुझाने के लिये नहीं,
चेतना को प्रकाशित करने के लिये जाना गया था।
अवतारवाद की-माया ने अनंत शिव को भी
“ज्योतिर्लिंग” और“जल-हरि” में बदल दिया—
और हम अग्नि को अर्पण नहीं, पदार्थ चढ़ाने लगे।
मौन को मंत्र बना दिया,
और ध्यान को आडंबर।
जिस सत्य-अग्नि को भीतर महाकाली की तरह धारण करना था,
उसे बाहर की वस्तुओं में खो दिया।
जिस विवेक से कालभैरव बनकर असत्य और अहंकार का सिर काटना था,
उसी विवेक को “पाप” कहकर दबा दिया।
आज हम अपने सामने लाखों हिन्दुओं का संहार देख चुके , पाकिस्तान , कश्मीर, बंगाल में हिन्दू महिलाओं का बलात्कार, धर्मांतरण और अत्याचार देखने के बाद भी हम कालभैरव बनने के बजाय , विष्णु अवतार ( कल्कि ) का इंतजार कर रहे है !!
हम नहीं इस समस्या का निदान कोई उद्धारक करेगा !! ये सोचकर भजन कथा माया के लाभ पुण्य ज्योतिष पंचांग के भरोसे बैठे है ।
जरा सोचे , विष्णु के 9 अवतार हो चुके है और हिन्दू पूरे विश्व में कहाँ तक सिमट चुके है ??
अगर विष्णु अवतार ही परमेश्वर का रुप है तो ईश्वर पुत्र जीसस और ईश्वर दूत पैग़म्बर मोहम्मद कौन है ?? जिन्हें मानने वाले पूरे विश्व में सबसे ज्यादा हो चुके है !! ये भी तो अवतार जैसे ही है !!
दरअसल,
आज हम यह भूलते जा रहे हैं कि—
हम स्वयं शिव-शक्ति के अंश हैं।
लेकिन उन्हें भी हमने रुपों में बाँध दिया है ।
अनंत महाकाल को योगी या ज्योतिर्लिंग और महाकाली की अग्नि 🔥 सत्य प्रकाश को अल्प वस्त्र पहने, जीभ्या बाहर निकाले हुए, काले वर्ण की स्त्री !!
हम सनातनी हिन्दू अपने भीतर की चेतना-शक्ति जगाने के बजाय,
अलग-अलग देव स्थानों पर प्रसाद / भोग / पदार्थ अर्पित करते हुए
कथा-माया के आडंबरों में उलझ रहे हैं—
और कमज़ोर, सिमटते , बँटते जा रहे हैं।
अब भी समय है।
शिव को बाहर ढूँढना छोड़ो—भीतर अनुभव करो।
अनंत प्रकाश को पहचानो,
अग्नि-तत्त्व को धारण करो,
और विवेक के साथ असत्य का संहार करो।
यही सनातन का पुनर्जागरण है—
यही शिव-सत्य।
डिस्क्लेमर
यह लेख दार्शनिक/प्रतीकात्मक विमर्श है।
किसी देवता, ग्रंथ या आस्था का अपमान उद्देश्य नहीं;
यह विचार-मंथन और प्रश्न करने का आमंत्रण है।
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