HIGHLIGHT FIRST:
- अवतार-कथा, कलियुग और सनातन चेतना का सबसे बड़ा भ्रम
- महाभारत के बाद धर्म स्थापित नहीं, अधर्म युग कलियुग आया।
- अवतार बढ़े, हिन्दू घटे।
- सुलह–युद्ध – प्रस्ताव की कथाओं ने भ्रमित किया
- अवतार से पहले अधर्म असुर किसने भेंजे ?
- सवाल रुके तो सनातन रुका।
महाभारत को “धर्मयुद्ध” कहा गया।
कृष्ण को “परमेश्वर” कहा गया।
और युद्ध को “धर्म की स्थापना” का माध्यम बताया गया।
परंतु स्वयं कथाएँ और इतिहास कुछ और संकेत देते हैं।
महाभारत के बाद:
• यदुवंश नष्ट हुआ
• स्वयं कृष्ण का अंत हुआ
• द्वारका समुद्र में समा गई
• सांब जैसे पात्रों ने अधर्म की सीमाएँ पार कीं
और अंततः शास्त्रों ने स्वयं घोषणा की—
कलियुग का आरंभ हुआ
यहीं से सबसे सीधा प्रश्न उठता है:
यदि महाभारत धर्म की स्थापना के लिए था,
तो धर्म आया कहाँ?
जिस युद्ध के बाद “अधर्म युग” की घोषणा हो,
वह युद्ध किस उद्देश्य का था?
- युद्ध के बाद शून्य: धर्म नहीं, विघटन
यदि महाभारत धर्म की विजय था, तो उसके बाद:
• समाज में स्थिरता क्यों नहीं आई?
• सनातन व्यवस्था मजबूत क्यों नहीं हुई?
• शस्त्रविद्या, राज्य-व्यवस्था और सामाजिक संतुलन क्यों टूटा?
वास्तविकता यह है कि:
• महाभारत में लगभग समस्त सनातन योद्धा मारे गए
• उनके साथ शस्त्र-ज्ञान, युद्ध-कौशल और रक्षा-परंपरा भी नष्ट हुई
• सनातन समाज भीतर से निर्बल हुआ
धर्म यदि रक्षा करता है, तो उसके बाद समाज और कमजोर क्यों हुआ?
- सुलह या युद्ध? अवतार-कथाओं का द्वंद्व (संशोधित विश्लेषण)
एक ओर कथाएँ कहती हैं—
राम और रावण
• सीता के अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से, सेना के साथ पहुँचे विष्णु अवतार राम
• लेकिन उसी राम ने अंगद के माध्यम से सुलह प्रस्ताव भेजा
यहाँ प्रश्न उठता है:
• यदि उद्देश्य सीता के अपमान का प्रतिकार था, तो सुलह क्यों?
• यदि रावण मान जाता, तो सीता के अपमान का क्या होता?
• युद्ध के लिए एकत्र सेना का क्या औचित्य रह जाता?
कृष्ण और दुर्योधन
• द्रौपदी के चीरहरण के बाद पांडव प्रतिज्ञा कर चुके थे
• फिर भी विष्णु अवतार कृष्ण दुर्योधन से पाँच गाँव की सुलह माँगने गए
यहाँ भी प्रश्न वही है:
• यदि दुर्योधन मान जाता, तो द्रौपदी के अपमान का क्या न्याय होता?
• क्या यह न्याय था या राजनीतिक गणना?
यही द्वंद्व —
पहले युद्ध की कथा, फिर सुलह का प्रस्ताव —
सनातन चेतना को भ्रमित करता है।
राम और कृष्ण की “स्वयं को महान सिद्ध करने की जुगत”
यही वह कथा-माया है जिसमें आज भी हिन्दू उलझे हैं —
और यही भ्रम उनके पतन का कारण बनता रहा है।
- पृथ्वीराज चौहान: करुणा या अवतार-माया?
पृथ्वीराज चौहान द्वारा मोहम्मद गौरी को बार-बार क्षमा करना
अक्सर “धर्माचरण” कहा जाता है।
परंतु संशोधित प्रश्न यह है:
• क्या यह विवेक था या राम-कृष्ण जैसी कथाओं से उपजी मानसिक जड़ता?
• स्वयं को “महान” सिद्ध करने की होड़ कितनी भारी पड़ी?
इस भ्रम का परिणाम:
• हज़ारों बलात्कार
• लाखों हत्याएँ
• पूरे भूभाग का सांस्कृतिक विनाश
और एक महत्वपूर्ण प्रश्न:
• क्या पृथ्वीराज अकेले युद्ध लड़ रहे थे?
• या उनकी सेना भी साथ थी, जो अंततः उकता गई कि
“हम कब तक जीतकर दुश्मन को छोड़ते रहेंगे?”
अंततः:
• सेना का मनोबल टूटा
• पृथ्वीराज हारे
• और गौरी ने कोई “महानता” दिखाने की मूर्खता नहीं की
परिणाम:
हिन्दू क्षेत्र का इतिहास हमेशा के लिए इस्लामिक इतिहास में बदल गया।
- कलियुग और सनातन का सिमटना
महाभारत के बाद आए कलियुग में:
• सनातन समाज पंथों, संप्रदायों और मतों में बँटता गया
• जो कभी वैश्विक सभ्यता था, वह भौगोलिक रूप से सिमटता गया
• आज सनातन एक सीमित क्षेत्र तक रह गया
प्रश्न स्पष्ट है:
हर अवतार के बाद धर्म मानने वालों की संख्या क्यों घटती गई?
यदि अवतार समाधान थे,
तो परिणाम उल्टा क्यों दिखता है?
- जय-विजय की कथा: न्याय या पूर्व-रचित कथानक?
पुराणों में कहा गया:
• जय और विजय विष्णु के द्वारपाल थे
• शापवश पृथ्वी पर राक्षस बने
• और बने: हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण, कुंभकर्ण, शिशुपाल, दंतवक्र
प्रश्न यह नहीं कि वे राक्षस थे या नहीं,
प्रश्न यह है:
• क्या उनके “शाप-मोचन” की सज़ा निर्दोष जनता को भुगतनी चाहिए थी?
• क्या यह न्याय है कि दैवी व्यवस्था की त्रुटि का दंड समाज झेले?
यदि अधर्म की उत्पत्ति
उसी व्यवस्था के भीतर से होती है,
तो अवतार किसे मिटा रहे थे?
- कालभैरव और नैतिक उलटबाँसी
सनातन परंपरा में कालभैरव —
असत्य और अहंकार का संहार करने वाले।
लेकिन ध्यान दीजिए:
• अहंकारी को दंड देने वाले कालभैरव को “पापी” कहा गया
• और असत्य को सहना “मर्यादा” बना दिया गया
यह सबसे खतरनाक उलटबाँसी है:
असत्य को दंड देना पाप,
और असत्य सहना पुण्य।
यहीं से सनातन चेतना निर्णायक बनने के बजाय भ्रमित होती है।
- आज की स्थिति: प्रतीक्षा, पतन और निर्भरता
आज हिन्दू समाज:
• अवतार और सरकार के भरोसे बैठा है
• वास्तविक खतरों को देखकर भी निर्णय टालता है
• विवेक के बजाय पत्थर, ग्रह, व्रत और पूजा में उलझा है
यह धर्म नहीं,
यह निर्णय से पलायन है।
- अंतिम चेतावनी: प्रश्न समाप्त हुए तो गुलामी स्थायी होगी
यही कारण है कि:
• यदि सनातन समाप्त हुआ,
• तो प्रश्न समाप्त होंगे
और प्रश्न समाप्त होते ही:
• पहले से ही शिव-सत्य से कट चुके पंथों और मज़हबों को
• भविष्य के AI-GOD / आदेश आधारित सत्ता में गुलाम बनाना आसान हो जाएगा
किताबी मज़हब, जो मृत्यु के बाद की ज़िंदगी की आस में जीते हैं,
उन्हें इस जीवन की स्वतंत्रता से कोई सरोकार नहीं रहता —
इसलिए उन्हें मशीन-आदेश आधारित मानव बनाना सरल होगा।
निष्कर्ष
विष्णु अवतार आते गए —
सनातनी चेतना, जो शिव-तत्त्व और सत्य-तत्त्व को जानती थी,
वह घटती गई।
धर्म स्थापना की घोषणा होती रही,
और अधर्म स्थापित होता गया।
अवतार और सरकारें आती गईं,
लेकिन हिन्दू सिमटता गया।
अब भी हम अवतार और सरकार के भरोसे बैठे हैं।
आख़िरी अवतार ही क्यों — कल्कि?
उसके बाद क्यों नहीं?
क्या इसका उत्तर यह है कि—
उसके बाद अवतार-कथा मानने वाले बचेंगे ही नहीं?
जरा सोचिए।
डिस्क्लेमर
यह लेख दार्शनिक, ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक विमर्श है।
इसका उद्देश्य किसी धर्म, समुदाय या व्यक्ति के प्रति घृणा फैलाना नहीं,
बल्कि प्रश्न, विवेक और आत्मचिंतन को प्रोत्साहित करना है।
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