उज्जैन के पास नागदा के बिड़ला ग्राम स्थित बड़े गणेश मंदिर में लगाया गया एक पोस्टर इन दिनों सुर्खियों में है। इस पोस्टर में लड़कियों के पहनावे को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिससे शहर में बहस और विवाद का माहौल बन गया है।
पोस्टर में माता-पिता से सवाल करते हुए कहा गया है,
- क्या माता-पिता अपनी छोटी बेटियों को टीवी शो और फिल्मों से प्रभावित होकर अमर्यादित कपड़े पहनाने की अनुमति देते हैं?
- क्या पिता अपनी 10 वर्ष से अधिक उम्र की बेटियों के फूहड़ पहनावे पर चुप रहते हैं?
- क्या हम छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियों को ‘मॉडर्न’ समझने की सोच रखते हैं?
- बेटियों को विचारों की आजादी दें, लेकिन अमर्यादित पहनावे की नहीं।
- शालीन कपड़े आपकी बेटी के लिए सुरक्षा कवच हैं।
इस पोस्टर में कहा गया है कि बेटियों को “सोच की आज़ादी होनी चाहिए, पहनावे की नहीं।” इसे “शालीनता से मंदिर में प्रवेश करें” जैसी चेतावनी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
पुजारी महासंघ का समर्थन
अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के अध्यक्ष महेश शर्मा ने इस पोस्टर का समर्थन करते हुए कहा कि, “मंदिर केवल पूजा का नहीं, संस्कृति और मर्यादा का भी केंद्र होता है। युवतियों को मंदिर की गरिमा बनाए रखनी चाहिए।”
सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रिया
पोस्टर वायरल होते ही सोशल मीडिया दो धड़ों में बंट गया —
- एक पक्ष इसे “संस्कृति की रक्षा” बता रहा है
- दूसरा पक्ष इसे महिलाओं की व्यक्तिगत आज़ादी पर हमला बता रहा है
प्रशासन की चुप्पी
विवाद के बाद भी स्थानीय प्रशासन और मंदिर समिति की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यह स्पष्ट नहीं है कि पोस्टर स्थायी रूप से लगाया गया है या अस्थायी रूप से। इसके हटाए जाने या बनाए रखने को लेकर चर्चा जारी है।
निष्कर्ष:
यह घटना न सिर्फ नागदा बल्कि पूरे प्रदेश में महिलाओं की स्वतंत्रता बनाम सांस्कृतिक मर्यादा की बहस को एक बार फिर सतह पर ले आई है। सवाल उठता है — क्या धार्मिक स्थलों पर आचार-संहिता तय होनी चाहिए या व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए?
