HIGHLIGHTS FIRST :

  • जिसे एक समझते हो- वो भीतर से टूटा है !
  • मुसलमान का सबसे बड़ा दुश्मन—दूसरा मुसलमान !!
  • दिखावे की एकता- अंदरूनी जंग!
  • ⁠हिन्दू बटा हुआ या मुसलमान बिखरा हुआ !

मुसलमान का सबसे बड़ा “दुश्मन” काफ़िर नहीं, बल्कि उसका अपना फिरक़ावादी-कट्टर दृष्टिकोण और दूसरे मुसलमानों को “गलत” ठहराने की प्रवृत्ति है।

थोड़ा गौर करें तो—

इस्लामी इतिहास और वर्तमान में सबसे अधिक हिंसा मुसलमान-विरुद्ध-मुसलमान रही है: सुन्नी-शिया संघर्ष, वहाबी-सूफी टकराव, देवबंदी-बरेलवी विवाद, तालिबान-आईएस-अल-क़ायदा जैसी आपसी जंगें।
• “काफ़िर” बाहरी पहचान है, लेकिन तक़फीर (दूसरे मुसलमान को काफ़िर घोषित करना) ने भीतर से समाज को तोड़ा है।

• सत्ता, व्याख्या (कुरान-हदीस), इमामत/ख़िलाफ़त और जातीय-क्षेत्रीय वर्चस्व—इन्हीं मुद्दों पर आंतरिक शत्रुता सबसे तीखी रही है।
• नतीजा: मुस्लिम देशों और समुदायों में सबसे ज़्यादा जानें मुसलमानों की ही गईं, बाहरी टकरावों से कहीं अधिक।

काफ़िर से संघर्ष राजनीतिक हो सकता है, लेकिन मुसलमान को सबसे ज़्यादा नुकसान उसके अपने अंदर के विभाजन और कट्टरता ने पहुँचाया है।

मुसलमान ऊपर से एक, भीतर से बिखरे

क्यों इस्लामी दुनिया ‘काफ़िर बनाम मुसलमान’ से ज़्यादा ‘मुसलमान बनाम मुसलमान’ से जूझ रही है

आज वैश्विक राजनीति और मीडिया में यह धारणा फैलाई जाती है कि इस्लाम एक संगठित, एकजुट धार्मिक ब्लॉक है, जो बाहरी दुनिया से टकराव की स्थिति में है।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे उलट है—

इस्लामी समाज का सबसे बड़ा संकट बाहरी नहीं,
बल्कि आंतरिक टकराव है।

इतिहास और वर्तमान—दोनों गवाही देते हैं कि
इस्लामी दुनिया में सबसे ज़्यादा संघर्ष मुसलमानों के बीच ही हुए हैं।

  • इस्लाम: एक पहचान, अनेक व्याख्याएँ

इस्लाम को अक्सर एक धर्म, एक किताब, एक पैगंबर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
लेकिन व्यवहार में यह एकरूप नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय (Plural) परंपरा है।
• दो प्रमुख सम्प्रदाय: सुन्नी और शिया
• परंपरागत हदीसों में 73 फिरकों का उल्लेख
• वास्तविकता में दर्जनों धार्मिक, कानूनी और सांस्कृतिक धाराएँ

सुन्नी इस्लाम के चार प्रमुख फ़िक़्ही स्कूल—
• हनफ़ी
• शाफ़ई
• मलिकी
• हंबली

शिया इस्लाम में—
• इथना अशरी (ट्वेलवर)
• इस्माइली
• ज़ैदी
• जाफ़री

इसके अलावा—सलफ़ी, वहाबी, देवबंदी, बरेलवी, अहले हदीस, सूफी, बोहरा, द्रुज़ जैसे पंथ।

यह विविधता तथ्य है, समस्या नहीं।
समस्या तब शुरू होती है जब कोई एक धारा खुद को एकमात्र सही घोषित करती है।

  • कट्टरता का मूल: “हम ही सच्चे, बाकी ग़लत”

आधुनिक इस्लामी कट्टरवाद की जड़ में एक ही दावा है—

“हमारा इस्लाम ही असली है।”

इस दावे के बाद क्रमशः:
• दूसरे मुसलमान “भटके” कहे जाते हैं
• फिर “काफ़िर”
• और अंततः “मारने योग्य”

इसी मानसिकता के कारण—
• शिया मस्जिदों पर हमले
• सूफी दरगाहों की तबाही
• बरेलवी-देवबंदी संघर्ष
• और आईएसआईएस द्वारा मुसलमानों का नरसंहार

दर्ज इतिहास बताता है कि
कट्टर संगठनों द्वारा मारे गए लोगों में बहुसंख्यक मुसलमान ही हैं।

  • इतिहास की सच्चाई: इस्लाम कभी एक नहीं रहा
  • इस्लाम का आंतरिक विभाजन पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु (632 ई.) के तुरंत बाद शुरू हो गया। • उत्तराधिकार विवाद: अबू बकर बनाम अली
    • करबला (680 ई.) के बाद स्थायी सुन्नी-शिया विभाजन
    • आगे चलकर क्षेत्रीय राजनीति, साम्राज्य और संस्कृति ने अलग-अलग इस्लाम गढ़े

ईरान का इस्लाम,
सऊदी अरब का इस्लाम,
इंडोनेशिया का इस्लाम—
तीनों व्यवहार में अलग हैं।

“एक इस्लाम” का विचार ऐतिहासिक रूप से गलत है।

दक्षिण एशिया: इस्लाम के भीतर सामाजिक विभाजन

दक्षिण एशिया में इस्लाम अपनाने के बावजूद सामाजिक ढाँचे बने रहे—
• अशराफ (सैयद, शेख, पठान)
• अजलाफ
• अरज़ल / पसमांदा

कुरान समानता सिखाता है,


लेकिन व्यवहार में—
• विवाह में भेदभाव
• अलग मस्जिदें और कब्रिस्तान
• पसमांदा आंदोलन

यह दिखाते हैं कि
इस्लामी समाज भी सामाजिक यथार्थ से अछूता नहीं है।

कट्टरता इन असमानताओं को छुपाती है,
ताकि सवाल भीतर न उठें।

इस्लामी दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती
न हिन्दू है, न ईसाई, न यहूदी—

सबसे बड़ी चुनौती है—
भीतर का अस्वीकार।

जब तक इस्लाम अपनी ही विविध आवाज़ों को स्वीकार नहीं करता,
तब तक कट्टरता नए-नए रूपों में लौटती रहेगी।

शांति की शुरुआत बाहर से नहीं,
भीतर से होती है।

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