- कलियुग की शुरुआत : श्रीकृष्ण ने कलि दानव को क्यों दिया वरदान ?
- भविष्यपुराण के श्लोकों के आलोक में एक असहज सत्य !
- कलिदानव को किसने दी अधर्म फैलाने की शक्ति ?
(Satya Darshan – शोधात्मक लेख)
भूमिका : प्रश्न जो भक्ति नहीं, विवेक से उठता है
सनातन परंपरा में अवतारवाद को प्रायः रक्षा, करुणा और धर्म-स्थापना का प्रतीक माना गया है।
परंतु भविष्यपुराण और भागवत पुराण के कुछ प्रसंग एक ऐसा प्रश्न उठाते हैं,
जिससे सामान्य भक्ति-वाचन अक्सर बचता रहा है—
यदि स्वयं ईश्वर कलियुग में कलि को अधिकार देते हैं,
तो उस अधिकार से पीड़ित सामान्य मानव का दोष क्या है?
यह लेख उसी प्रश्न का सामना करता है —
बिना संकोच, बिना आवरण।
भविष्यपुराण का संदर्भ : कलियुग प्रवेश और कलि की तपस्या
भविष्यपुराण के प्रतिसर्ग पर्व में, कलियुग के प्रारंभ से संबंधित
कुछ उत्तरकालीन/क्षेत्रीय पांडुलिपियों में
कलि–दानव द्वारा श्रीकृष्ण की तपस्या और संवाद का वर्णन मिलता है।
कलि की कठोर तपस्या
द्वादश वर्षसहस्राणि तपस्तेपे कलिः स्वयम्।
जलभक्षणमात्रेण वायुभक्षी च मौनव्रतः॥
कलि बारह वर्षों (या प्रतीकात्मक सहस्र वर्षों) तक
जल–वायु आहार और मौन व्रत से तप करता है।
यह तथ्य अपने आप में चौंकाने वाला है,
क्योंकि यहाँ कलि को कोई अराजक दानव नहीं,
बल्कि तपस्वी सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
श्रीकृष्ण का प्राकट्य और कलि की शरणागति
तपस्या पूर्ण होने पर श्रीकृष्ण राधा सहित प्रकट होते हैं—
ततः सम्पूज्य गोविन्दं राधया सह संस्थितम्।
दृष्ट्वा कलिः प्रणेमेऽसौ भक्त्या परमया युतः॥
कलि उन्हें देखकर शरणागति स्वीकार करता है—
अहं तव चरणाम्भोजं शरणं गतवान् प्रभो।
कलौ मां पालय स्वामिन् न हन्यां तव तेजसा॥
यहाँ कलि स्वयं को ईश्वर-शरणागत भक्त के रूप में प्रस्तुत करता है,
न कि किसी विद्रोही शक्ति के रूप में।
श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया वरदान : अधिकार या अनुमति?
भविष्यपुराण के इन्हीं पाठों में
श्रीकृष्ण कलि को कलियुग में सीमित अधिकार देते हैं—
कलौ राज्यं धनं भोगान् स्त्रीसौख्यं च ददाम्यहम्।
अधर्मप्रवृत्तेषु लोकेषु विचरिष्यसि॥
अर्थात्:
• राज्य
• धन
• भोग
• स्त्री-सौभाग्य
परंतु केवल उन्हीं स्थानों पर
जहाँ समाज स्वयं अधर्म की ओर प्रवृत्त हो।
साथ ही एक स्पष्ट सीमा—
निवासस्ते न कर्तव्यो मद्भक्तजनसन्निधौ।
यत्र धर्मः स्थिरो नित्यं तत्राहं सदा स्थितः॥
कलि को भक्तों और धर्मनिष्ठ जनों से दूर रहने का निर्देश दिया गया।
भागवत पुराण का समर्थन : कलि के चार स्थान
यह अवधारणा भविष्यपुराण तक सीमित नहीं है।
भागवत पुराण (1.17) इसे और स्पष्ट करता है—
द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः।
तत्राधर्मश्च कलिः स्याद् लोभश्चानृतमेव च॥
अर्थात्:
• जुआ (लोभ)
• मदिरा (विवेक-नाश)
• वेश्यागमन (काम)
• हिंसा/अन्याय
यही कलि के निवास स्थान हैं।
यहाँ कलि कारण नहीं,
बल्कि परिणाम बन जाता है।
सबसे कठिन प्रश्न :
क्या माया-चक्र के लिए मानव को कष्ट सहना ही पड़ेगा?
अवतारवादी दर्शन का कटु सत्य यही है—
कलि को पूरी तरह रोका नहीं जाता,
उसे नियंत्रित मात्रा में स्वीकार किया जाता है।
इस प्रक्रिया में:
• समाज टूटता है
• स्त्रियाँ सबसे अधिक पीड़ित होती हैं
• बच्चे और वृद्ध कुचले जाते हैं
और इन सबको
“काल”, “लीला”, “कर्मफल” कहकर वैध ठहरा दिया जाता है।
यह वही तर्क है जो
जय–विजय की कथा में भी दिखता है—
दोष विष्णु जी के द्वारपालों का,
पर सज़ा पूरी मानवता को !!
कलि का संहार और अवतार की वापसी
भविष्यपुराण स्वयं स्वीकार करता है—
अन्ते तु कालसंप्राप्ते कल्किरूपेण केशवः।
नाशयिष्यति तां शक्तिं या दत्ता ते कलौ युगे॥
अर्थात्:
• जो शक्ति दी गई
• वही शक्ति समय आने पर नष्ट की जाएगी
पर प्रश्न यह है—
इस “अंत” तक
बीच का समय कौन भुगतेगा?
उत्तर स्पष्ट है—
सामान्य मानव।
सत्य दर्शन : अवतारवाद का असहज निष्कर्ष
इन श्लोकों को साथ रखकर एक सत्य उभरता है—
अवतारवादी माया अधर्म को समाप्त नहीं करती,
उसे प्रबंधित करती है।
इस मॉडल में:
• पीड़ा एक स्वीकार्य लागत (collateral) है
• न्याय भविष्य में टाल दिया जाता है
• और मानव चेतना को
“प्रतीक्षा” में बाँध दिया जाता है
विचार करें :
यदि मानव का अस्तित्व केवल
कष्ट सहने और किसी अवतार की प्रतीक्षा तक सीमित है,
तो यह मुक्ति नहीं —
एक दिव्य प्रबंधन तंत्र है।
आग्रह यही है—
- क्या अवतारवादी दर्शन के काल माया चक्र का मतलब ना चाहते हुए भी अत्याचार सहना है ?
- रावण कुंभकर्ण , हिरण्याक्ष- हिरण्यकशिपु, शिशुपाल – दन्तवक्र सब विष्णु जी के ही द्वारपाल जय विजय के जन्म थे जिनके अत्याचारों की सजा निर्दोष मानवों ने भुगती – क्या सिर्फ विष्णु जी के अवतार चक्र के लिये ?
- यहाँ तक की श्रीकृष्ण से वरदान प्राप्त करने वाला कलि दानव जो आज कलियुग में अत्याचार की पराकाष्ठा लाँघ चुका है – इसे मारने से पहले यानि कल्कि अवतार के प्रतिष्ठित होने के लिये क्या मानव और पशुओं का अत्याचारियों के सामने पीड़ित , शोषित और क्रंदन करना जरुरी है ?
- क्या ये सब जरुरी ‘सामग्री ‘ है किसी अवतार को अवतरित होने के लिये ?
सोचे :
सत्यम शिवम सुंदरम् ।
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