– कृष्णमोहन झा
इतिहास हमेशा शोर नहीं करता, कई बार वह सदियों तक मौन रहकर केवल प्रतीक्षा करता है।
प्रतीक्षा उस क्षण की, जब सत्य स्वयं दस्तावेजों से निकलकर वर्तमान के सम्मुख खड़ा हो जाए। धार की भोजशाला सदियों से ऐसी ही प्रतीक्षा में थी—अपनी पहचान की, अपने सम्मान की और अपने पुनर्स्मरण की।
माननीय उच्च न्यायालय का निर्णय केवल एक न्यायिक आदेश नहीं है, यह उन पीढ़ियों के धैर्य, आस्था और संघर्ष का प्रतिफल है जिन्होंने मां सरस्वती की इस भूमि को अपनी सांस्कृतिक चेतना का केंद्र मानकर वर्षों तक शांतिपूर्ण संघर्ष किया। यह निर्णय उन पत्थरों की मौन पीड़ा का उत्तर भी है, जो वर्षों से अपनी वास्तविक पहचान की प्रतीक्षा कर रहे थे।
परमार वंश के यशस्वी शासक राजा भोज ने धार को केवल एक राजधानी नहीं बनाया था, बल्कि उसे ज्ञान, साहित्य, दर्शन और संस्कृति की ऐसी पुण्यभूमि के रूप में स्थापित किया था, जहाँ शब्द भी साधना थे और शिक्षा भी उपासना। भोजशाला केवल एक मंदिर नहीं थी, वह भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंत पाठशाला थी, जहाँ मां वाग्देवी की आराधना के साथ ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित होती थी।
लेकिन इतिहास के कुछ कालखंड ऐसे भी आए जब आक्रमणों की धूल ने अनेक सांस्कृतिक प्रतीकों की पहचान धूमिल कर दी। भोजशाला भी उसी पीड़ा की साक्षी बनी। संरचनाएँ बदलीं, दावे बदले, व्यवस्थाएँ बदलीं, लेकिन समाज की स्मृति नहीं बदली। हिंदू समाज ने दशकों तक लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में रहकर इस स्थल की पहचान के लिए संघर्ष किया।
बसंत पंचमी इस संघर्ष का सबसे भावनात्मक अध्याय रही। जिस स्थान को हिंदू समाज मां सरस्वती की आराधना स्थली मानता रहा, वहाँ पूजा-अर्चना के अधिकार को लेकर हर वर्ष तनाव की स्थिति बनती रही। किंतु इस वर्ष एक नया दृश्य सामने आया जब मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के नेतृत्व में बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजन शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। यह केवल प्रशासनिक सफलता नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि संवेदनशील विषयों का समाधान इच्छाशक्ति, संवाद और संतुलन से संभव है।
अब यह ऐतिहासिक संयोग भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि वर्षों से चला आ रहा यह विवाद डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में निर्णायक मोड़ पर पहुँचा है। राजनीति में कुछ उपलब्धियाँ योजनाओं से प्राप्त होती हैं, किंतु कुछ अवसर स्वयं इतिहास चुनकर किसी नेतृत्व को सौंपता है। भोजशाला का यह निर्णय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लिए ऐसा ही एक दुर्लभ अवसर है।
हाल ही में सोमनाथ मंदिर में आयोजित “सोमनाथ विरासत के 75 वर्ष” अथवा “सोमनाथ अमृत पर्व” केवल धार्मिक आयोजन नहीं था। वह भारत की सभ्यतागत चेतना, सांस्कृतिक स्वाभिमान और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का विराट उत्सव बन गया। उसने यह संदेश दिया कि विरासत केवल स्मरण का विषय नहीं होती, उसे भविष्य की प्रेरणा में भी बदला जा सकता है।
ठीक उसी प्रकार मध्यप्रदेश सरकार को भोजशाला के इस ऐतिहासिक निर्णय को केवल न्यायालय के आदेश तक सीमित नहीं रहने देना चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को चाहिए कि वे यहाँ एक विराट सांस्कृतिक आयोजन की परिकल्पना करें—ऐसा आयोजन जिसमें मां वाग्देवी, राजा भोज की विरासत, भारतीय ज्ञान परंपरा और सामाजिक समरसता—सभी एक साथ दिखाई दें।
यदि केंद्र सरकार के सहयोग से वाग्देवी की प्रतिमा पुनः भारत लाई जाती है, यदि भोजशाला को भारतीय ज्ञान परंपरा के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित किया जाता है, यदि यहाँ वार्षिक सांस्कृतिक महोत्सव प्रारंभ होता है—तो यह केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल को ऐतिहासिक पहचान दे सकती है।
इस उपलब्धि का उत्सव भी उसी परिपक्वता के साथ मनाया जाना चाहिए, जो भारत की आत्मा का मूल स्वभाव है। यह किसी की हार या पराजय का उत्सव नहीं होना चाहिए। भारत की आत्मा प्रतिशोध में नहीं, पुनर्स्मरण में विश्वास करती है। भारत की शक्ति टकराव में नहीं, समरसता में निहित है।
यदि इस क्षण को सांस्कृतिक पुनर्जागरण, ऐतिहासिक न्याय और सभ्यतागत चेतना के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो इसका सामाजिक और राजनीतिक संदेश अत्यंत व्यापक होगा।
अयोध्या में राम मंदिर काशी में विश्वनाथ कॉरिडोर , उज्जैन में महकाल लोक सोमनाथऔर अब भोजशाला—ये केवल स्थान नहीं हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति के पुनर्जागरण के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
सदियों तक मौन रहे पत्थरों ने अंततः अपनी बात कह दी है।
अब यह नेतृत्व पर निर्भर है कि वह इसे केवल एक निर्णय मानता है या इतिहास के नए अध्याय की शुरुआत।
भोजशाला अब अतीत का विवाद नहीं, भारत के सांस्कृतिक भविष्य का अवसर बन चुकी है|
– कृष्णमोहन झा
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)
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