नालंदा विश्वविद्यालय और उसकी विशाल लाइब्रेरी को जलाने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख ये हैं:
• धार्मिक असहिष्णुता और बौद्धिक चुनौती:
कई इतिहासकारों का मानना है कि बख्तियार खिलजी को नालंदा विश्वविद्यालय में सनातन धर्म के प्रभाव तथा वहां की बौद्धिक श्रेष्ठता से खतरा महसूस हुआ।
उसे लगा कि नालंदा में जिस तरह से सनातन धर्म का ज्ञान फल-फूल रहा हैं, वह इस्लाम के प्रसार में बाधा है, इसलिए उसने विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया।
• ज्ञान और चिकित्सा श्रेष्ठता में ईर्ष्या:
कुछ विद्वानों के अनुसार, खिलजी नालंदा विश्वविद्यालय के चिकित्सा ज्ञान से भी ईर्ष्या करता था। कहा जाता है कि जब उसकी बीमारी नालंदा के वैद्यों ने ठीक कर दी, तो वह इस बात से नाराज हुआ कि उसके अपने हकीम ऐसा नहीं कर पाए। इसी जलन में उसने ज्ञान की पूरी परंपरा को मिटा देने का निर्णय लिया।
• शिक्षा और संस्कृति का विरोध:
खिलजी का मकसद सनातन धर्म की शिक्षा, संस्कृति और अनुसंधान के उस केंद्र को खत्म करना था, जो उस समय दुनिया भर में ज्ञान का सबसे बड़ा भंडार था। लाइब्रेरी में 90 लाख से ज्यादा किताबें थीं, जिन्हें जलाने में महीनों लग गए।
निष्कर्ष:
नालंदा विश्वविद्यालय को जलाने का असल मकसद धार्मिक असहिष्णुता, बौद्धिक श्रेष्ठता से ईर्ष्या, और सनातन धर्म की शिक्षा-संस्कृति के केंद्र को नष्ट करना था, जिससे उस समय के ज्ञान, चिकित्सा और धार्मिक विविधता को भारी नुकसान हुआ ।
परिणाम :
आज सनातन हिन्दू भारतवासी जो विश्व में सर्वश्रेष्ठ थे और चिकित्सा की सर्वश्रेष्ठ पद्धति के ज्ञाता थे आज बीमार असहाय और पूरी तरह से ईसाई मॉर्डन मेडिकल साइंस के भरोसे हो गये है । जहाँ इलाज की आड़ में धर्मांतरण- महंगा इलाज और कोई स्थायी रोग समाधान नहीं है ।
विशेष टिप्पणी :
ज्ञान की भाषा संस्कृत रही है । संस्कृत को जानिये – भारतीय वैदिक ज्ञान की उपलब्ध ग्रंथों को पढ़िये और समझिये ।
सब यहीं से चुराया है पश्चिम और अरबों ने ।
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