ऐतिहासिक स्मृति पर चला बुलडोज़र
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने उस स्मारक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है, जो 1971 के ऐतिहासिक मुक्ति संग्राम की याद में बना था। यह वही संग्राम था जिसने बांग्लादेश को पाकिस्तान के अमानवीय शासन से आज़ादी दिलाई थी। यह स्मारक सिर्फ एक कलाकृति नहीं था, बल्कि देश की अस्मिता, संघर्ष और बलिदान की पहचान का प्रतीक था।
जिन्ना की विरासत से आज़ादी और जमातियों के खिलाफ आवाज़
यह स्मारक पाकिस्तान की बर्बर सेना और उनके स्थानीय सहयोगी जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के अत्याचारों के खिलाफ देश की सामूहिक प्रतिरोध भावना को दर्शाता था। इसमें 1952 के भाषा आंदोलन से लेकर 1971 के नरसंहार और अंत में पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण तक की ऐतिहासिक झलकियाँ थीं।
यूनुस सरकार की पहली कार्रवाई: स्मारक को ढका और फिर रौंदा गया
मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली नई अंतरिम सरकार ने सत्ता में आते ही सबसे पहले इस स्मारक को कपड़े से ढकवा दिया था। कुछ ही महीनों में इसे बुलडोजर से रौंद दिया गया। यह कार्य न केवल प्रशासनिक फैसला था, बल्कि प्रतीकों और स्मृतियों को मिटाने की एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति के तहत किया गया।
छात्र आंदोलन की आड़ में नया स्मारक
सरकार ने अब इस ऐतिहासिक स्मारक की जगह एक नया स्मारक बनाने की घोषणा की है जो बीते वर्ष हुए छात्र आंदोलनों की “याद” में होगा। आलोचकों का मानना है कि यह प्रयास बांग्लादेश की वास्तविक राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान को ढकने और एक मजहबी राष्ट्र की परिकल्पना को गहराने की ओर इशारा करता है।
सांस्कृतिक पुनर्लेखन की खतरनाक प्रवृत्ति
मुक्ति संग्राम स्मारक का विध्वंस केवल एक इमारत का नाश नहीं है, बल्कि यह पूरे राष्ट्र की स्मृति, इतिहास और पहचान पर हमला है। इससे स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश की वर्तमान सरकार मजहबी कट्टरता की विचारधारा से प्रभावित होकर इतिहास को नए सांचे में ढालने का प्रयास कर रही है।
लालमोनिरहाट की कला और राष्ट्रवाद की हत्या
लालमोनिरहाट ज़िले में स्थित वह पत्थर पर तराशा गया स्मारक एक विशिष्ट कलाकृति थी, जिसमें बांग्लादेश की स्वतंत्रता की पूरी कहानी उकेरी गई थी — 1950 के दशक का भाषा आंदोलन, 7 मार्च का भाषण, मुजीब-उर-रहमान का नेतृत्व, और 1971 का संघर्ष। आज यह सब मलबे में तब्दील कर दिया गया है।
जनता में रोष, बौद्धिक वर्ग में चिंता
देश के कई हिस्सों में इस कार्रवाई को लेकर विरोध देखा जा रहा है। बौद्धिक वर्ग, छात्र संगठन और संस्कृति प्रेमी इसे बांग्लादेशी राष्ट्रवाद पर सीधा हमला मान रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी यह विषय तेजी से ट्रेंड कर रहा है।
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