नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि धर्म का अर्थ केवल ईश्वर की उपासना नहीं, बल्कि जीवन के हर रिश्ते और कर्तव्य में निहित आचरण है। नागपुर में धर्म जागरण न्यास के नवनिर्मित कार्यालय के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मातृत्व धर्म, पितृ धर्म, मित्र धर्म, पुत्र धर्म, राजधर्म, प्रजा धर्म—ये सभी धर्म हैं, और इन्हें निष्ठा से निभाने वाला ही सच्चा धार्मिक है।
भागवत ने कहा कि धर्म ठीक रहने से समाज में शांति और सद्भाव बना रहता है, कलह और विषमता दूर रहती है। संकट के समय धर्म पर चलने वाला व्यक्ति साहस और समाधान का मार्ग पाता है। समाज का दायित्व है कि लोग धर्म के पथ से कभी विचलित न हों।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म को सच्चे अर्थों में ‘मानव धर्म’ कहा जा सकता है क्योंकि यह विविधताओं को अपनाना और सभी में अपनापन पैदा करना सिखाता है। भागवत ने कहा, “हम अलग दिख सकते हैं, परन्तु एक हैं। गंतव्य सबका एक ही है, इसलिए अपने रास्ते पर चलें लेकिन दूसरों के रास्ते को जबरदस्ती बदलने की कोशिश न करें।”
संघ प्रमुख ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे गुरुत्वाकर्षण का अस्तित्व हमारे मानने या न मानने से नहीं बदलता, वैसे ही धर्म का सत्य भी अटल है। इतिहास के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने छत्रपति संभाजी महाराज के बलिदान को धर्म रक्षा का प्रेरक प्रतीक बताया, साथ ही उनके जीवन पर बनी फिल्म ‘छांवा’ का जिक्र किया।
मुख्य बिंदु
- धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन में कर्तव्यपालन की प्रेरणा।
- मातृत्व, पितृत्व, मित्रता, राजधर्म, प्रजा धर्म — सभी धर्म का हिस्सा।
- हिंदू धर्म: विविधताओं को अपनाने और अपनापन सिखाने वाला मानव धर्म।
- समाज का कर्तव्य: धर्म पथ से लोगों को विचलित न होने देना।
- धर्म सत्य है, मानो या न मानो—उसका अस्तित्व अटल है।
लेखक कृष्णमोहन झा राजनीतिक विश्लेषक है ।
