भोपाल का छोटा तालाब, जिसे अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर साइट का दर्जा प्राप्त है, गंभीर प्रदूषण की चपेट में है। संयुक्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार, इस जलाशय में रोज़ाना 80 लाख से 1 करोड़ लीटर तक सीवेज पहुंच रहा है। चिंताजनक बात यह है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के स्पष्ट निर्देशों और करोड़ों रुपये की परियोजनाओं के बावजूद तालाब को सीवेज मुक्त नहीं बनाया जा सका है।
NGT के आदेशों के बाद भी नहीं सुधरे हालात
NGT ने 7 मई को निर्देश दिए थे कि छोटे तालाब को पूरी तरह सीवेज मुक्त किया जाए, सभी नालों की 100 प्रतिशत टैपिंग सुनिश्चित हो और कैचमेंट व बफर ज़ोन में अवैध गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। इसके बाद गठित संयुक्त समिति ने 13 जुलाई को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें तालाब की मौजूदा स्थिति को गंभीर बताया गया।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को NGT में प्रस्तावित है।
ओवरफ्लो हो रहे चैंबर, सीधे तालाब में पहुंच रहा गंदा पानी
बारिश के दौरान सीवेज लाइन के चैंबर ओवरफ्लो होने से गंदा और बदबूदार पानी सीधे छोटे तालाब में पहुंच रहा है। इससे अमृत परियोजना के तहत विकसित सीवेज नेटवर्क की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।
28 नालों का पानी सीधे तालाब में
रिपोर्ट के मुताबिक, छोटे तालाब में 28 छोटे-बड़े नाले मिलते हैं और लगभग सभी से सीवेज का पानी पहुंच रहा है। बड़े तालाब से आने वाले ताज़े पानी की आपूर्ति बंद होने के बाद अब छोटे तालाब में साफ पानी का कोई स्थायी स्रोत नहीं बचा है।
खिलाड़ियों की सेहत पर भी मंडराया खतरा
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसी तालाब में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी अभ्यास करने को मजबूर हैं। प्रदूषित पानी में नियमित प्रशिक्षण उनकी सेहत पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
बड़े सवाल
- NGT के आदेशों के बावजूद छोटे तालाब को सीवेज मुक्त क्यों नहीं किया जा सका?
- करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी परियोजनाओं का अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिला?
- रामसर साइट जैसे अंतरराष्ट्रीय महत्व के जलाशय की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
- क्या खिलाड़ियों और शहरवासियों के स्वास्थ्य के साथ समझौता किया जा रहा है?
- क्या संबंधित एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी?
11 अगस्त की सुनवाई पर टिकी निगाहें
अब सभी की नजर 11 अगस्त को होने वाली NGT की सुनवाई पर है। उम्मीद की जा रही है कि इस सुनवाई के बाद तालाब को प्रदूषण से बचाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। भोपाल की पहचान माने जाने वाले इस ऐतिहासिक जलाशय को बचाना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि शहर के भविष्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न भी है।
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