“धर्मार्थकाममोक्षाणाम् आरोग्यं मूलमुत्तमम्।”

मिहिर कुमार/

भारतीय मनीषा ने मानव जीवन के चार परम पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—की सिद्धि के लिए जिस तत्व को सर्वोपरि माना है, वह है आरोग्य। स्वस्थ शरीर और निर्मल चित्त के बिना न तो मनुष्य अपने कर्तव्यों का समुचित निर्वहन कर सकता है और न ही जीवन के उच्चतर उद्देश्यों की प्राप्ति कर सकता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को केवल शारीरिक निरोगता तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उसे संपूर्ण जीवन-दर्शन का आधार स्वीकार किया गया है। भगवान धन्वंतरि इसी आरोग्य चेतना के अधिष्ठाता देवता हैं। सनातन परंपरा में उन्हें आयुर्वेद का प्रवर्तक, चिकित्सा विज्ञान का आदि गुरु तथा भगवान श्रीहरि विष्णु का अवतार माना गया है। उनकी उपासना केवल रोगों से मुक्ति की कामना नहीं, बल्कि दीर्घायु, मानसिक शांति, चित्त की निर्मलता और जीवन में संतुलन की प्रार्थना भी है।

भगवान धन्वंतरि का स्वरूप भारतीय धार्मिक आस्था के साथ-साथ उस प्राचीन ज्ञान परंपरा का भी प्रतीक है, जिसने मानव शरीर, प्रकृति और स्वास्थ्य के पारस्परिक संबंधों को गहराई से समझने का प्रयास किया। वैदिक एवं पौराणिक वांग्मय में स्वास्थ्य का संबंध केवल शरीर की रोगमुक्त अवस्था से नहीं, बल्कि आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तापों से मुक्ति की व्यापक अवधारणा से जोड़ा गया है। भारतीय चिकित्सा-दर्शन का मूल भाव इस सूत्र में अभिव्यक्त होता है—“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”, अर्थात शरीर ही समस्त धर्माचरण और जीवन के श्रेष्ठ उद्देश्यों की सिद्धि का प्रथम साधन है। इसीलिए शरीर की रक्षा, रोगों का निवारण और जीवनशक्ति का संरक्षण भारतीय चिंतन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। भगवान धन्वंतरि की परंपरा इसी विचार को दैवीय आस्था और चिकित्सा-ज्ञान के समन्वय के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

भगवान धन्वंतरि के चतुर्भुज स्वरूप का वर्णन विशेष रूप से अर्थपूर्ण है। उनके चार हाथों में शंख, चक्र, जलौका और अमृत कलश सुशोभित बताए गए हैं। धार्मिक दृष्टि से ये उनके दिव्य स्वरूप के आयुध और प्रतीक हैं, किंतु इनके भीतर निहित भावार्थ को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि से भी समझने का प्रयास किया जा सकता है। जलौका अर्थात जोंक का उल्लेख प्राचीन शल्य चिकित्सा में रक्तमोक्षण की एक विधि की ओर संकेत करता है। आधुनिक चिकित्सा में भी विशिष्ट परिस्थितियों में जोंक चिकित्सा का उपयोग किया जाता है। विशेषकर पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा में रक्त के जमाव और शिरापरक अवरोध से उत्पन्न समस्याओं के उपचार में चिकित्सकीय निगरानी के अंतर्गत इसका उपयोग होता है। जोंक की लार में पाया जाने वाला हिरुडिन रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इस दृष्टि से धन्वंतरि के हाथ में जलौका का होना प्राचीन भारतीय चिकित्सा परंपरा में रक्तमोक्षण संबंधी ज्ञान की स्मृति को सामने लाता है।

उनके हाथ में सुशोभित अमृत कलश जीवन, दीर्घायु, पुनरुत्थान और आरोग्य का प्रतीक है। आयुर्वेद में रसायन चिकित्सा का उद्देश्य शरीर की धातुओं का पोषण, बल और ओज की रक्षा तथा स्वस्थ जीवन की अवधि को बढ़ाना माना गया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में कोशिकीय क्षति की मरम्मत, प्रतिरक्षा तंत्र, पोषण और पुनर्योजी चिकित्सा पर होने वाले अनुसंधान भी जीवन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य संरक्षण से जुड़े हैं। हालांकि अमृत की पौराणिक अवधारणा और आधुनिक जैव-रासायनिक उपचारों को एक ही वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं माना जा सकता, फिर भी दोनों में जीवन की रक्षा और आरोग्य की कामना का एक व्यापक भाव-साम्य अवश्य दिखाई देता है।


शंख और चक्र भी भगवान धन्वंतरि के स्वरूप में विशिष्ट प्रतीकात्मक महत्व रखते हैं। शंख भारतीय परंपरा में पवित्रता, मंगल और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। आयुर्वेद में शंख भस्म का उल्लेख भी मिलता है, जिसका पारंपरिक रूप से कुछ पाचन संबंधी विकारों में उपयोग किया जाता रहा है। इसी प्रकार चक्र गति, कालचक्र, अनुशासन और निरंतरता का प्रतीक है। आधुनिक शरीर विज्ञान में जैविक घड़ी और सर्कैडियन रिदम के माध्यम से शरीर की अनेक क्रियाओं का समयबद्ध संचालन समझा जाता है। औषधि सेवन के समय और शरीर की जैविक लय के बीच संबंध पर भी चिकित्सा विज्ञान में अध्ययन हुए हैं। इस प्रकार धन्वंतरि के दिव्य स्वरूप में निहित प्रतीकों को जीवन और स्वास्थ्य के व्यापक अनुशासन के रूप में समझा जा सकता है।


भगवान धन्वंतरि की चिकित्सा परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष संबंध महर्षि सुश्रुत से स्थापित होता है। सुश्रुत को भारतीय शल्य चिकित्सा परंपरा का महान आचार्य माना जाता है और उनकी रचना ‘सुश्रुत संहिता’ विश्व चिकित्सा इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहरों में सम्मिलित है। इस ग्रंथ में शल्य चिकित्सा, शरीर रचना, रोग निदान, औषधियों और शल्य उपकरणों का विस्तृत विवेचन मिलता है। सुश्रुत संहिता की परंपरा भगवान धन्वंतरि को शल्यतंत्र के गुरु के रूप में प्रतिष्ठित करती है। इस गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व इसलिए भी असाधारण है कि इसमें चिकित्सा को केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं माना गया, बल्कि अनुभव, अभ्यास, निरीक्षण और व्यावहारिक दक्षता से जोड़कर देखा गया।


सुश्रुत संहिता में शरीर रचना के अध्ययन के लिए शव के निरीक्षण और विच्छेदन की विधि का उल्लेख मिलता है। इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि केवल पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर कोई व्यक्ति कुशल शल्य चिकित्सक नहीं बन सकता। उसे शरीर की संरचना, अंगों की स्थिति, मांसपेशियों, अस्थियों और अन्य अवयवों का प्रत्यक्ष ज्ञान भी होना चाहिए। शल्य चिकित्सा में हाथ की निपुणता विकसित करने के लिए विभिन्न प्राकृतिक वस्तुओं पर अभ्यास कराने की परंपरा का भी वर्णन मिलता है। फल और सब्जियों पर चीरा लगाने, विभिन्न पदार्थों पर टांके लगाने तथा कमलनाल जैसी वस्तुओं पर वेधन का अभ्यास कराने के उल्लेख इस बात के साक्ष्य हैं कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण को विशेष महत्व दिया जाता था। आज आधुनिक चिकित्सा शिक्षा में जिस प्रकार सिम्युलेशन, मॉडल और प्रशिक्षण उपकरणों के माध्यम से शल्य कौशल विकसित किया जाता है, उसकी मूल भावना से इस प्राचीन अभ्यास पद्धति का साम्य दिखाई देता है।

शल्य उपकरणों के वर्गीकरण और उनके निर्माण संबंधी विवरण भी सुश्रुत परंपरा की वैज्ञानिक दृष्टि को प्रकट करते हैं। सुश्रुत संहिता में विभिन्न प्रकार के यंत्रों और शस्त्रों का वर्णन मिलता है। इन उपकरणों की संरचना, उपयोग और उनकी धार की सूक्ष्मता के संबंध में दिए गए निर्देश बताते हैं कि शल्य चिकित्सा में उपकरणों की गुणवत्ता और चिकित्सक की दक्षता को कितना महत्व दिया जाता था। इस परंपरा ने भारतीय चिकित्सा ज्ञान को केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि शल्य विज्ञान के व्यवस्थित विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।


आयुर्वेद का त्रिदोष सिद्धांत भी शरीर और स्वास्थ्य को समझने की एक विशिष्ट दार्शनिक एवं चिकित्सकीय अवधारणा प्रस्तुत करता है। वात, पित्त और कफ को शरीर की क्रियात्मक व्यवस्था के तीन प्रमुख आधार माना गया है। वात का संबंध गति और संचार से, पित्त का पाचन एवं रूपांतरण की प्रक्रियाओं से तथा कफ का स्थिरता, संरचना और पोषण से जोड़ा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार इन तीनों दोषों का संतुलन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है और इनके असंतुलन से रोग उत्पन्न हो सकते हैं। आधुनिक शरीर विज्ञान में होमियोस्टैसिस अर्थात शरीर के आंतरिक वातावरण को संतुलित बनाए रखने की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यद्यपि त्रिदोष सिद्धांत और आधुनिक होमियोस्टैसिस को एक-दूसरे का प्रत्यक्ष वैज्ञानिक पर्याय नहीं कहा जा सकता, लेकिन दोनों में शरीर के आंतरिक संतुलन और उसकी समग्र क्रियाशीलता को स्वास्थ्य का आधार मानने की समान दृष्टि दिखाई देती है।
भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का पौराणिक प्रसंग भी भारतीय चिंतन में आरोग्य के महत्व को अत्यंत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त करता है। श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और महाभारत में वर्णित समुद्र मंथन की कथा के अनुसार देवताओं और असुरों द्वारा क्षीरसागर का मंथन किए जाने पर अनेक दिव्य रत्न प्रकट हुए। इन्हीं में भगवान धन्वंतरि भी थे, जो अपने हाथों में अमृत कलश धारण किए हुए प्रकट हुए। मान्यता है कि उनका आविर्भाव कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को हुआ था, जिसे आज हम धनतेरस अथवा धन्वंतरि त्रयोदशी के नाम से जानते हैं। समुद्र मंथन की यह कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन में ज्ञान, साधना, संघर्ष और सृजन की प्रक्रिया का भी प्रतीकात्मक आख्यान है। मंथन से पहले विष का निकलना और अंततः अमृत की प्राप्ति इस बात का रूपक है कि किसी भी महान उपलब्धि के लिए कठिनाइयों, चुनौतियों और निरंतर प्रयासों से गुजरना पड़ता है। चिकित्सा विज्ञान की यात्रा भी निरंतर अनुसंधान, प्रयोग, परीक्षण और अनुभव से होकर आगे बढ़ती है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वितीय स्कंध के सातवें अध्याय में भगवान विष्णु के अवतारों का वर्णन करते हुए भगवान धन्वंतरि के अवतरण और उनके आयुर्वेद संबंधी अवदान का उल्लेख मिलता है

“धन्वन्तरिश्च भगवान्स्वयमेव कीर्तिर्नाम्ना नृणां पुरुरुजां रुज आशु हन्ति।
यज्ञे च भागममृतायुरवावरुन्ध आयुर्वेदं च निगदितं भुवि सोऽभ्यधत्त॥”

इस श्लोक का भावार्थ है कि भगवान धन्वंतरि मनुष्यों के अनेक रोगों का निवारण करने वाले, अमृत और आयु के प्रदाता तथा पृथ्वी पर आयुर्वेद के ज्ञान का प्रवर्तन करने वाले भगवान विष्णु के अवतार हैं। श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कंध में समुद्र मंथन के प्रसंग में उनके दिव्य स्वरूप और अमृत कलश धारण किए हुए प्राकट्य का वर्णन मिलता है। विष्णु पुराण और महाभारत के आदि पर्व में भी समुद्र मंथन तथा धन्वंतरि के आविर्भाव से संबंधित प्रसंग उल्लिखित हैं। इन सभी आख्यानों में भगवान धन्वंतरि को आरोग्य, औषधि और जीवन संरक्षण के अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
सुश्रुत संहिता में वर्णित धन्वंतरि परंपरा भारतीय चिकित्सा ज्ञान के व्यवस्थित स्वरूप को समझने की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है। काशी के राजा दिवोदास को धन्वंतरि परंपरा का आचार्य माना गया है। सुश्रुत और उनके सहपाठी उनसे चिकित्सा ज्ञान प्राप्त करने के लिए उपस्थित होते हैं। वे प्राणियों को शारीरिक और मानसिक रोगों से पीड़ित देखकर उनके कष्टों के निवारण का उपाय जानना चाहते हैं। इस प्रसंग में चिकित्सा का उद्देश्य केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता को कष्टों से मुक्त करना बताया गया है। आयुर्वेद को आठ अंगों—शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतंत्र, रसायन और वाजीकरण—में विभाजित किया गया है। इन आठ अंगों के माध्यम से शरीर, मन, रोग, औषधि, शल्य चिकित्सा और जीवनशक्ति के संरक्षण को समग्र रूप से समझने का प्रयास किया गया। यह वर्गीकरण प्राचीन भारतीय चिकित्सा परंपरा की व्यापकता और विषयगत समृद्धि को रेखांकित करता है।


भगवान धन्वंतरि की उपासना का पर्व धनतेरस भारतीय समाज में आरोग्य और मंगल की कामना का विशेष अवसर है। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाए जाने वाले इस पर्व पर धन्वंतरि पूजन, दीपदान और स्वास्थ्य की कामना की जाती है। भारत सरकार ने वर्ष 2016 से धन्वंतरि जयंती को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने की परंपरा प्रारंभ की, जिससे आयुर्वेद की प्राचीन ज्ञान-संपदा और आधुनिक समय में उसकी प्रासंगिकता को व्यापक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का अवसर मिला है। यह पहल इस बात का भी स्मरण कराती है कि भारतीय चिकित्सा परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुसंधान, संवाद और जनजागरण की संभावनाओं से युक्त एक जीवंत ज्ञानधारा है।

आज जब पूरी दुनिया स्वास्थ्य संबंधी नई चुनौतियों, जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों और मानसिक तनाव के बढ़ते प्रभाव से जूझ रही है, तब भगवान धन्वंतरि की परंपरा में निहित समग्र आरोग्य-दृष्टि का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। आयुर्वेद प्रकृति के अनुकूल जीवनचर्या, संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, ऋतुचर्या, औषधीय ज्ञान और शरीर-मन के संतुलन पर बल देता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी रोगों के निदान, शल्य चिकित्सा, औषधि अनुसंधान और जीवनरक्षक उपचारों के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है। आज आवश्यकता इस बात की है कि प्राचीन ज्ञान परंपराओं का अध्ययन खुले मन से किया जाए, उनके उपयोगी सिद्धांतों का वैज्ञानिक परीक्षण हो और प्रमाणों के आधार पर उन्हें समकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था में उचित स्थान मिले। परंपरा के प्रति श्रद्धा और विज्ञान के प्रति तर्कशीलता का यह समन्वय ही भारतीय चिकित्सा-दर्शन को भविष्य के लिए अधिक उपयोगी बना सकता है।

भगवान धन्वंतरि का संदेश अंततः यही है कि आरोग्य केवल रोग का अभाव नहीं, बल्कि जीवन के प्रति संतुलित, अनुशासित और सकारात्मक दृष्टिकोण का नाम है। स्वस्थ शरीर, निर्मल मन और संतुलित जीवन ही मनुष्य को अपने चारों पुरुषार्थों की सार्थक सिद्धि की ओर ले जा सकते हैं। इसलिए धन्वंतरि की उपासना का वास्तविक अर्थ केवल उनके समक्ष आरोग्य की प्रार्थना करना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और मानव सेवा के प्रति समर्पण को अपने जीवन का अंग बनाना भी है। भारतीय संस्कृति में भगवान धन्वंतरि इसी शाश्वत आरोग्य चेतना के प्रतीक हैं—एक ऐसी चेतना, जिसमें आस्था और ज्ञान, परंपरा और प्रयोग तथा जीवन और चिकित्सा एक-दूसरे के पूरक बनकर मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
(लेखक आरोग्य भारती के राष्ट्रीय कार्यालय प्रमुख है)

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