सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्मा जी ने रचना प्रारंभ की, तब उनके भीतर अहंकार की एक लहर उठी — “मैं ही सृष्टिकर्ता हूँ, मुझसे बड़ा कोई नहीं।” यही क्षण था जब “पंचम सिर” का जन्म हुआ — जो ज्ञान नहीं, बल्कि अहंकार, असत्य और लालसा का प्रतीक बना।
जब परमशिव ने तेजोमयी लिंग रूप में अनादि-अनंत स्वरूप धारण किया, ब्रह्मा और विष्णु ने उस अनंत ज्योति के आदि-अंत की खोज की। विष्णु ने विनम्र होकर स्वीकार किया कि वे पार नहीं पा सके, परंतु ब्रह्मा के पंचम सिर ने झूठ बोला — कहा कि उन्होंने शिवलिंग का आदि पा लिया।
यही “असत्य” का प्रथम उच्चारण था।
पंचम सिर का अर्थ :
पंचम सिर केवल एक अंग नहीं था, बल्कि असत्य की प्रवृत्ति का प्रतीक था — जो सृष्टि के सत्य से अलग होकर अपनी ही सत्ता स्थापित करना चाहता है।
शिव ने उस असत्य को काटकर यह संदेश दिया कि जो सत्य से विमुख होगा, वह अपने तेज से ही भस्म होगा।

कलियुग में पंचम सिर की पुनरावृत्ति :
युगों के परिवर्तन के साथ वही “पंचम सिर की प्रवृत्ति” अनेक रूपों में लौटती रही —
कभी अहंकार के रूप में,
कभी झूठे गुरुओं, मसीहाओं, पैगंबरों या स्वघोषित उद्धारकों के रूप में,
कभी सत्ता, धन, और वासना के मायाजाल के रूप में।

इस प्रवृत्ति का उद्देश्य केवल एक है —
मनुष्य को शिव से, सत्य से, आत्मज्ञान से दूर करना।
यह माया लोक में आकर्षण, भय और लालच के माध्यम से लोगों को भ्रमित करती है।
यह कहती है — “सत्य मुझमें है,”
जबकि सत्य तो सदैव शिव में है —
जिसमें न द्वेष है, न भेदभाव, न लालच, न वासना।
असत्य की वर्तमान अभिव्यक्ति :
आज की दुनिया में यह “पंचम सिर” विज्ञान के नाम पर, मनोरंजन के नाम पर, और भौतिक सुखों के नाम पर फिर सक्रिय है।
मनुष्य को अपनी ही चेतना से काट रहा है।
परिवार, संस्कृति, और जीवन-मूल्यों को क्षीण कर रहा है।

यह वही शक्ति है जो “शिव” — यानी अंतःशांति, सत्य, प्रेम और संयम — से मनुष्य को दूर कर रही है।
सत्य की पहचान :
सत्य किसी पंथ, धर्म या ग्रंथ का कैदी नहीं है।
सत्य वही है जो
• भय नहीं फैलाता,
• भेद नहीं करता,
• और सभी जीवों में एक ही चेतना देखता है।

शिव का अर्थ है —
वह जो सबका कल्याण करे, जो सबमें विद्यमान है।
जब तक मनुष्य भीतर के शिव से नहीं जुड़ता, तब तक पंचम सिर की माया उसे भ्रमित करती रहेगी।
निष्कर्ष :
महाभारत के पश्चात आरंभ हुआ कलियुग केवल बाह्य अंधकार नहीं है — यह अंतरात्मा के अंधकार का युग है।
जब हम असत्य, लालच और वासना को सत्य मानने लगते हैं, तब वही “पंचम सिर” हमारे भीतर जीवित हो जाता है।
शिव की साधना — सत्य, संयम और समर्पण की साधना — ही इस माया का अंत है।
असत्य चाहे जितना प्रबल दिखे, अंततः सत्य ही विजय पाता है — जैसे तेजोमयी लिंग के सम्मुख पंचम सिर झुका था।
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