ये लेख नहीं – आडंबरों का नाशक है ।
सत्य शिव है — और शिव सबमें है
• न वह किसी वस्तु से प्राप्त होते है
• न किसी कथा से सीमित होते है
• न किसी संस्था से नियंत्रित होते है
तेजोमयी प्रकाश स्तंभ हमें यही स्मरण कराता है:
- ब्रह्मा जी जानते हैं – बहुत कुछ,
- विष्णु संभालते हैं – बहुत कुछ,
- लेकिन पूर्ण सत्य—मौन शिव और उनका प्रकाश ही है।
प्राचीन कथा का आधार: शिव पुराण की अमर घटना
शिव पुराण में वर्णित एक प्राचीन कथा हमें सृष्टि के उस मूल रहस्य से रूबरू कराती है, जिसे न तो ग्रंथों से जाना जा सकता है और न ही कर्मकांडों से पाया जा सकता है। यह कथा वेदों के रचयिता ब्रह्मा और सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु के बीच हुए एक विवाद से प्रारंभ होती है
एक ऐसा विवाद, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि सृजन और पालन करने वाली चेतनाएँ भी पूर्ण सत्य नहीं जानतीं।
एक समय ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही अपने-अपने स्थान पर स्वयं को सर्वोच्च मानने लगे।
ब्रह्मा बोले—
“मैं आदि हूँ, सृष्टि का रचयिता हूँ।”
विष्णु ने प्रत्युत्तर दिया—
“नहीं, मैं अनादि हूँ, सम्पूर्ण सृष्टि का पालनकर्ता हूँ।”
यह संवाद शीघ्र ही विवाद में बदला, और विवाद युद्ध में।
यह युद्ध केवल दो देवताओं के बीच नहीं था—
यह अहंकार बनाम सत्य का संघर्ष था।
दोनों के भीतर वर्चस्व की भावना, श्रेष्ठ सिद्ध होने की लालसा और सूक्ष्म द्वेष था।
विवाद बढ़ता गया… और तभी—
तेजोमयी प्रकाश स्तंभ अग्निलिंग का प्राकट्य: जहाँ खोज समाप्त हो जाती है
अचानक आकाश और पाताल को चीरता हुआ
एक अनंत तेजोमयी प्रकाश स्तंभ प्रकट हुआ।
न उसका आदि दिखा,
न अंत।
वह अग्निलिंग थे —
न किसी रूप में बंधा,
न किसी नाम में।
यह कोई देव नहीं थे
यह साक्षात सत्य शिव का प्राकट्य था।
ब्रह्मा और विष्णु में उन प्रकाश स्तंभ का आदि और अंत खोजने की प्रतिस्पर्धा स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने हेतु शुरू हुई ।
विष्णु ने उस स्तंभ का निचला छोर खोजने का निश्चय किया।
वे वराह रुप लेकर नीचे की ओर गए—
परंतु जहाँ खोज थी, वहाँ खोजने वाला भी था—
और जहाँ खोजने वाला है, वहाँ द्वैत है।
ब्रह्मा हंस पर सवार होकर ऊपर की ओर गए।
आकाश, लोक, महालोक—
पर कोई छोर नहीं मिला।
विष्णु लौट आए।
उन्होंने स्वीकार किया—
“मैं अंत नहीं पा सका।”
परंतु यहाँ कथा निर्णायक मोड़ लेती है।
केतकी पुष्प का पाप: असत्य और अहंकार का प्रतीक
ब्रह्मा ने सत्य स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने झूठ का सहारा लिया।
उन्होंने कहा—
“मैं ऊपर तक गया था।
वहाँ मुझे केतकी पुष्प मिला, वही गवाही देगा कि मैंने स्तंभ का अंत देखा।”
केतकी पुष्प प्रकट हुआ—
और उसने झूठी गवाही दी।
यह क्षण केवल एक कथा नहीं है—
यह ज्ञान के पतन का क्षण है।
• ब्रह्मा = शब्द, वेद, रचना
• केतकी = बाहरी अर्पण, दिखावा
• झूठ = अहंकार
- यहाँ स्पष्ट हो गया कि
ज्ञान असत्य और अहंकार से भ्रष्ट हो सकता है।
महाकाल का मौन और कालभैरव का प्राकट्य
तभी महाकाल के उस तेजोमयी प्रकाश (महाकाली ) से बिजली सी चमक के साथ प्रकट हुए कालभैरव।
कालभैरव ने
ब्रह्मा के असत्य वाचक और अहंकारी पाँचवें सिर को अपने नाखून से काट दिया।
यह कोई क्रोध नहीं था।
यह सत्य का निर्णय था।
यह संदेश था—
जो असत्य बोलेगा,
जो अहंकार से ज्ञान का दावा करेगा,
तो वो चाहे देव ही क्यों ना हो – उसके अहंकार का नाश सत्य अवश्य करते है ।
और केतकी को श्राप मिला—
“तू कभी पूजा में अर्पित नहीं होगा।”
इसे समझें तो —
सत्य दरअसल किसी पदार्थ से नहीं मिलता।
सत्य को ढका भी नहीं जाता—बल्कि पहचाना जाता है।
- विष्णु का बोध: पालन भी पूर्ण सत्य नहीं
इस घटना के बाद
विष्णु समझ गए—
कि वे स्वयं भी
पूर्ण सत्य को नहीं जानते।
वे पालन करते हैं,
व्यवस्था चलाते हैं,
पर व्यवस्था भी माया के भीतर है।
अतः—
• ब्रह्मा = सीमित सृजन
• विष्णु = सीमित पालन
• महाकाल = पूर्ण सत्य
- वेदों से पहले का सत्य
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि—
यह तेजोमयी प्रकाश स्तंभ / अग्निलिंग प्राकट्य
वेदों के लिखे जाने से भी पहले का है।
अर्थात—
• सत्य ग्रंथों से पूर्व है
• शब्द से पहले मौन है
• ज्ञान से पहले बोध है
- इसलिए—
वेद सत्य की व्याख्या हैं,
सत्य वेदों की उपज नहीं।
- महाकाल मौन हैं — महाकाली प्रकाश / गति हैं
महाकाल अकर्ता, मौन, निर्विकार हैं।
महाकाली उनका तेजोमयी प्रकाश हैं।
यहाँ—
• कोई फूल नहीं चढ़ता
• कोई भोग नहीं
• कोई सौदा नहीं
क्योंकि—
प्रकाश को अर्पित नहीं किया जाता,
प्रकाश से स्वयं को जागृत किया जाता है।
- आधुनिक आडंबर और “चढ़ाओ–पटकाओ” का झूठ
आज का कर्मकांड कहता है—
• ये चढ़ाओ
• वो करो
• ये नियम
• वो व्रत
लेकिन सत्य प्रकाश अग्निलिंग का संदेश स्पष्ट है—
• केतकी = अर्पण/ चढ़ावे का दिखावा
• ब्रह्मा का झूठ = कर्मकांड
• अग्निलिंग = शुद्ध चेतना
पूजा पदार्थ से नहीं,
पहचान से होती है।
- कालभैरव को पापी बताने का षड्यंत्र
यह भी अत्यंत गौर करने योग्य है कि—
बाद में लिखे गए पुराणों और कथाओं में
शिव-आज्ञा से असत्य का सिर काटने वाले कालभैरव को ही पापी घोषित कर दिया गया।
उन्हें—
• ब्रह्महत्या का दोषी बताया गया
• भटकने वाला बना दिया गया
- जब मदिरा / शराब मानव जीवन के आरंभ में बनी ही नही – तो उन्हें शराब का भोग लेने वाला बताकर – उनके सत्य को ढंक दिया
• काशी का कोतवाल बनाकर कर्मकांडों में बाँध दिया गया - सत्य के प्रहरी को श्मशान का प्रहरी बता दिया गयासत्य के प्रहरी को श्मशान का प्रहरी बता दिया गया
- मकसद : आम आदमी सत्य को ही नही जान पाये और कर्मकांडों और कथाओं में उलझा रहे
यही सबसे बड़ा उलटफेर किया गया—
असत्य काटने वाला पापी बना,
और असत्य रचने वाले पूज्य बने।
पर सत्य यह है—
कालभैरव पापी नहीं,
कालभैरव को पापी बताने वाले महापापी हैं।
निष्कर्ष:
सत्य पहचानो — सशक्त हो जाओ
• ब्रह्मा जी पूर्ण सत्य नहीं जानते
• विष्णु जी भी पूर्ण सत्य नहीं जानते
• सत्य शिव ही पूर्ण सत्य हैं
और उनका तेजोमयी प्रकाश—
महाकाली—आपके भीतर है।
सत्य शिव है।
शिव सबमें है।
उसे चढ़ाना नहीं—पहचानना है।
यही कारण है कि—
आज हिंदू समाज
कालभैरव की तरह निर्णायक नहीं बनता,
बल्कि कर्मकांड करता है
और सोचता है—
“कोई और मेरी रक्षा करेगा ।”
आज हिन्दू पाप पुण्य के चक्कर में कटता जा रहा है और जिसे वध कहते हैं उसे हत्या समझ कर कर्मकांडों में उलझा हुआ है । और यही वजह है कि आज हिन्दू महिलाओं के साथ दुराचार और हिन्दू जनसंख्या का नरसंहार विश्व में सबसे ज़्यादा हो चुका है ।
- अवतार का इंतजार नहीं बल्कि स्वयं सत्य का अवतार यानि कालभैरव बने ।
- उठे – स्वयं को सशक्त बनाये
आडंबर नहीं— अखाड़ा।
नोट :
- शिव उपासक शैव पंथ है सबसे प्राचीन
आपको बता दें कि बाद में लिखे गये लेखों में अपने अपने ईष्ट के अनुसार उन्हें श्रेष्ठ बताया गया है लेकिन प्रमाण ये है कि सबसे प्राचीन शिव उपासक शैव पंथ ही है ।
शैव पंथ शैव-वैष्णव-शाक्त में सबसे प्राचीन है, क्योंकि इसकी जड़ें वैदिक रुद्र उपासना और सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी हैं।
वैष्णव का प्रमुख विकास गुप्त काल में और शाक्त का तांत्रिक रूप मध्यकाल में हुआ। अन्य प्रमुख पंथों में स्मार्त, गाणपत्य और सौर शामिल हैं, जो शंकराचार्य द्वारा एकीकृत ‘षण्मत’ व्यवस्था का हिस्सा हैं।
- शैव पंथ
शैव धर्म शिव को परमेश्वर मानता है, जिसमें पाशुपत (सबसे प्राचीन, 2री शताब्दी ई., लकुलीश संस्थापक) और कश्मीर शैव दर्शन प्रमुख हैं। वैदिक काल (1500 ई.पू.) के रुद्र से विकसित, सिंधु घाटी (8000 वर्ष पूर्व) के शिवलिंग प्रमाण मिलते हैं। नयनार संतों ने दक्षिण भारत में 6-9वीं शताब्दी में भक्ति रूप दिया।
- वैष्णव पंथ
विष्णु और उनके अवतारों (राम-कृष्ण) की उपासना पर आधारित, जड़ें उपनिषदों (800 ई.पू.) में हैं लेकिन संगठित रूप गुप्त काल (4-6वीं शताब्दी) में। अलवार संतों ने दक्षिण में प्रसार किया। पांच वैष्णव संप्रदाय: श्री, ब्रह्म, रुद्र, संतान और चतुर्विध।
- शाक्त पंथ
देवी (दुर्गा, काली) को सर्वोच्च शक्ति मानता है, सिंधु घाटी मातृदेवी पूजा से जुड़ा लेकिन तांत्रिक रूप 6वीं शताब्दी से। गुप्त काल में पूर्वी भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में लोकप्रिय। बंगाल, असम में प्रमुख।
अन्य पंथ
• स्मार्त: शंकराचार्य द्वारा स्थापित, पंचदेवता (शिव, विष्णु, शक्ति, गणपति, सूर्य) पूजा। अद्वैत वेदांत आधारित।
• गाणपत्य: गणेश को प्रधान मानते हैं, महाराष्ट्र-कर्नाटक केंद्रित।
• सौर: सूर्य उपासना, वैदिक मूल। षण्मत में एकीकृत।
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