HIGHLIGHTS FIRST :

  • भारत भवन में 14-15 सितंबर को मातृभाषा अनुष्ठान
  • CM डॉ. मोहन यादव करेंगे शुभारंभ
  • भारतीय भाषाओं पर दो दिन महामंथन
  • देशभर के पत्रकार-साहित्यकार होंगे शामिल

राष्ट्रीय हिंदी दिवस के अवसर पर राजधानी भोपाल का भारत भवन 14 और 15 सितंबर को भारतीय भाषाओं, साहित्य, संस्कृति और भारतीय जीवन-मूल्यों के व्यापक संवाद का केंद्र बनने जा रहा है। यहां दो दिवसीय ‘भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान’ का आयोजन किया जा रहा है, जिसका शुभारंभ 14 सितंबर को शाम 4 बजे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव करेंगे। आयोजन की केंद्रीय थीम ‘मातृभाषा, संस्कृति और भारतीय जीवन-मूल्यों पर संवाद’ रखी गई है।

आयोजन में देश के विभिन्न भाषाई क्षेत्रों से वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, कवि और भाषा विशेषज्ञ शामिल होंगे। कार्यक्रम में भाषाई पत्रकारिता, मातृभाषाओं की भूमिका, डिजिटल युग की चुनौतियां, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एकता जैसे विषयों पर संवाद होगा।

भाषाओं की विविधता में भारतीयता की खोज

‘भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान’ का उद्देश्य केवल हिंदी के प्रचार तक सीमित नहीं है। कार्यक्रम की रूपरेखा में भारत की अलग-अलग भाषाओं और बोलियों के माध्यम से साझा सांस्कृतिक चेतना को समझने तथा भाषाओं के बीच संवाद को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। आयोजन में साहित्य, पत्रकारिता, कविता, संत परंपरा, संगीत और प्रदर्शनी जैसे विभिन्न आयाम शामिल किए गए हैं।

कार्यक्रम का आयोजन वीर भारत न्यास एवं संस्कृति संचालनालय, मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा किया जा रहा है। इसमें माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान और मातृभाषा मंच की सहभागिता रहेगी।

14 सितंबर: उद्घाटन से राष्ट्रीय कवि सम्मेलन तक

14 सितंबर को शाम 4 बजे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कार्यक्रम का शुभारंभ करेंगे।

इसके बाद शाम 4:30 से 5:30 बजे तक पहला सत्र होगा—

‘मातृभाषा से राष्ट्रभाषा : भाषाओं में भारत की आत्मा’

इस सत्र में बांग्ला, हिंदी और कश्मीरी भाषाई परंपराओं से जुड़े वक्ता अपने विचार रखेंगे। सत्र का समन्वय माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी करेंगे।

इसके बाद शाम 6 से 7:30 बजे तक ‘भाषाई पत्रकारिता, समाज की आवाज़’ विषय पर विमर्श होगा। इसमें वरिष्ठ संपादक और पत्रकारिता तथा भारतीय विरासत से जुड़े विशेषज्ञ भाग लेंगे।

शाम 7:30 बजे राष्ट्रीय कवि सम्मेलन

पहले दिन का सबसे बड़ा आकर्षण राष्ट्रीय कवि सम्मेलन होगा। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए कवि अपनी रचनाओं का पाठ करेंगे।

इसके अलावा शाम 4 बजे ‘पूर्वरंग’ में भारतीय भाषाओं और बोलियों के गीतों की प्रस्तुति भी होगी।

15 सितंबर: डिजिटल युग में मातृभाषा पर मंथन

दूसरे दिन की शुरुआत शाम 4 बजे होगी।

पहले सत्र का विषय है—

‘डिजिटल युग में मातृभाषाएँ : संकट, संभावना और नई पत्रकारिता’

यह सत्र खास तौर पर वर्तमान समय में महत्वपूर्ण है, क्योंकि डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और नई तकनीक के दौर में भाषाओं के सामने एक तरफ नए अवसर हैं तो दूसरी तरफ सामग्री, पाठक और भाषाई पत्रकारिता से जुड़ी नई चुनौतियां भी हैं।

उर्दू, मराठी और असमिया सहित विभिन्न भाषाओं के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक इस विषय पर अपने विचार रखेंगे।

‘भाषा अनेक, भारत एक’

15 सितंबर को शाम 5:30 से 7 बजे तक दूसरा प्रमुख विमर्श होगा—

‘भाषा अनेक, भारत एक’

इस सत्र में अलग-अलग भारतीय भाषाओं से जुड़े पत्रकार और वक्ता इस बात पर संवाद करेंगे कि भाषाई विविधता किस तरह भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करती है।

संत कवियों की वाणी से होगा समापन

दूसरे दिन शाम 7:30 बजे ‘संत राग’ कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसमें सुश्री सुधा रघुरामन, नई दिल्ली संत कवियों की वाणी प्रस्तुत करेंगी।

इससे आयोजन को साहित्यिक विमर्श के साथ भारतीय संत परंपरा और लोक-सांस्कृतिक चेतना से भी जोड़ा जाएगा।

शब्द-चित्र और भारतीय भाषाओं की प्रदर्शनी

आयोजन स्थल पर भारतीय भाषाओं से संबंधित प्रदर्शनी और शब्द-चित्र भी लगाए जाएंगे।

प्रदर्शनी में भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों तथा साहित्यिक सामग्री को प्रदर्शित किए जाने की योजना है।

आयोजकों के अनुसार महर्षि पाणिनि, भोजदेव, महर्षि पतंजलि, भर्तृहरि और सम्राट राजेंद्र चोल जैसे व्यक्तित्वों से जुड़े विषय भी प्रदर्शनी और प्रकाशन गतिविधियों का हिस्सा होंगे।

कई पुस्तकों का होगा लोकार्पण

आयोजन के दौरान विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक पुस्तकों का लोकार्पण भी प्रस्तावित है।

इनमें ‘युग-युगीन जल’, ‘उड़ चल अपने देश’, ‘अष्टावक्र गीता’, ‘नारद गीता’, ‘गर्भ गीता’, ‘ब्राह्मण गीता’, ‘उत्तर गीता’, ‘परमहंस गीता’, ‘वृत्र गीता’, ‘हंस गीता’, ‘चंद्र गीता’, ‘जानकी गीता’ तथा ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला—हिंदी साहित्य के प्रकाश पुंज’ जैसी पुस्तकें शामिल हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह आयोजन?

भारत की भाषाई विविधता दुनिया की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विशेषताओं में से एक है। हिंदी के साथ बंगाली, मराठी, कश्मीरी, उर्दू, असमिया, मलयालम सहित अनेक भाषाएं अपने-अपने साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक अनुभवों को आगे बढ़ाती हैं।

ऐसे समय में जब डिजिटल माध्यम भाषा के उपयोग और प्रसार का तरीका बदल रहे हैं, मातृभाषा और नई पत्रकारिता के बीच संबंध पर चर्चा विशेष महत्व रखती है।

2025 में भी भोपाल में भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान आयोजित हुआ था, जिसमें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मातृभाषा को संस्कृति और संवेदना का आधार बताया था।

इस वर्ष का आयोजन उसी व्यापक विमर्श को आगे बढ़ाते हुए मातृभाषा, भारतीय संस्कृति, पत्रकारिता और डिजिटल युग को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास है।


publicfirstnews.com

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