50 साल बाद लौट आई दोस्ती: जयपुर की वो री-यूनियन जिसने समय को भी रोक दिया
“हैलो… पहचान कौन?”
और फिर 50 साल का समय अचानक पिघल गया…
जयपुर की एक शांत दोपहर में जब फोन की घंटी बजी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि अगला कुछ मिनट उन्हें सीधे 1970 के दशक में ले जाएगा।
दूसरी तरफ आवाज़ आई —
“यार… मैं बृज बोल रहा हूँ…”
कुछ सेकंड की ख़ामोशी…
फिर अचानक हँसी, भावुकता, यादें… और काँपती हुई आवाज़ में सिर्फ एक शब्द —
“अरे… तू?”
यहीं से शुरू हुई वो कहानी, जिसने 50 साल पुरानी दोस्ती को फिर से जीवित कर दिया।

बृज गुप्ता — वो शख़्स जिसने बिखरे हुए दोस्तों को फिर एक आसमान के नीचे ला दिया
हर कहानी में एक ऐसा किरदार होता है जो सिर्फ इंसान नहीं, एक भावना बन जाता है।
इस कहानी में वो नाम है — बृज गुप्ता।
20 जून 1963 को जन्मे और जयपुर को अपना गृह नगर मानने वाले बृज कुमार गुप्ता ने वाणिज्य (बी.कॉम.) की शिक्षा प्राप्त की। जीवन के विभिन्न चरणों में उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र में जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद उनके मित्रों के लिए हमेशा एक सच्चे दोस्त की ही रही।
समय के साथ सभी दोस्त अपनी-अपनी मंजिलों की ओर निकल गए। कोई प्रशासनिक सेवा में पहुँचा, कोई बैंकिंग के शीर्ष पदों तक, कोई चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने लगा। धीरे-धीरे संपर्क टूटते गए और आधी सदी बीत गई।
लेकिन बृज गुप्ता के मन में दोस्ती का वह धागा कभी नहीं टूटा।
जहाँ अधिकांश लोग पुरानी यादों को सिर्फ याद करके आगे बढ़ जाते हैं, वहीं बृज गुप्ता ने उन यादों को फिर से जीने का संकल्प लिया। उन्होंने पुराने नाम खोजे, संपर्कों की कड़ियाँ जोड़ीं, रिश्तेदारों और परिचितों से जानकारी जुटाई और एक-एक करके उन दोस्तों तक पहुँचे जो समय की धूल में कहीं खो गए थे।
यह काम आसान नहीं था। सोशल मीडिया से पहले बिछड़े हुए लोगों को 50 साल बाद खोजना किसी जासूसी अभियान से कम नहीं था। लेकिन बृज गुप्ता ने हार नहीं मानी। उनकी मेहनत, लगन और मित्रों के प्रति समर्पण ने अंततः वह कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
जब पुराने दोस्तों के फोन बजने लगे और वर्षों बाद आवाज़ें एक-दूसरे तक पहुँचीं, तो हर किसी के मन में एक ही नाम था — बृज गुप्ता।
असल मायनों में इस री-यूनियन के सूत्रधार, संयोजक और आत्मा यदि कोई थे, तो वे बृज गुप्ता ही थे।
उनकी पहल ने सिर्फ लोगों को नहीं मिलाया, बल्कि पाँच दशक पुरानी हँसी, शरारतें, सपने और भावनाएँ भी फिर से जीवित कर दीं। उन्होंने साबित कर दिया कि सच्ची दोस्ती समय, दूरी और परिस्थितियों से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है।
इसलिए जब भविष्य में इस ऐतिहासिक मित्र-मिलन की कहानी सुनाई जाएगी, तो शायद लोग यह अवश्य कहेंगे—
“दोस्त तो बहुत थे, लेकिन उन्हें फिर से एक परिवार बनाने वाला एक ही था — बृज गुप्ता।”
समय सबको अपनी दिशा में बहा ले गया था।
कोई प्रशासन में चला गया…
कोई बैंकिंग की ऊँचाइयों तक पहुँचा…
कोई डॉक्टर बना…
कोई उद्योगपति…
कोई सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल…
लेकिन बृज गुप्ता के भीतर शायद दोस्ती अब भी वहीं खड़ी थी… उसी पुराने मोड़ पर।
उन्होंने सिर्फ दोस्तों को ढूँढा नहीं…
उन्होंने समय के बिखरे हुए पन्नों को फिर से जोड़ दिया।
पुराने नंबर खोजे गये…
किसी के रिश्तेदार से संपर्क हुआ…
किसी का शहर बदला हुआ मिला…
किसी का देश…
लेकिन तलाश जारी रही।
और फिर धीरे-धीरे…
एक-एक कर दोस्त वापस लौटने लगे।
जब “रिटायर” लोग फिर से जवान हो गये
इस री-यूनियन की सबसे खूबसूरत बात ये नहीं थी कि लोग सफल थे।
बल्कि ये थी कि इतने बड़े-बड़े पदों पर पहुँचने के बाद भी, सबके भीतर वही पुराना लड़का अब भी ज़िंदा था।

डॉ. शरद निमावत

राजस्थान सरकार के महाविद्यालय शिक्षा विभाग में खेल अधिकारी रहे।
आज सेवानिवृत्त हैं, लेकिन खेल और संगीत दोनों से उनका रिश्ता अब भी उतना ही जीवंत है।
शोध करने वाले विद्यार्थियों की मदद करना…
मंच पर गाना…
और फिर पुराने दोस्तों के बीच वही कॉलेज वाला अंदाज़…
जैसे समय ने उन्हें छुआ ही नहीं।

मनोज गुप्ता
जयपुर विद्युत वितरण निगम से वरिष्ठ लेखा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त।
आज परिवार, पोते-पोतियों और सुकून भरे जीवन में व्यस्त हैं।
लेकिन जब दोस्तों का कॉल आया, तो जैसे जिंदगी ने अचानक “रिवाइंड” बटन दबा दिया।

राणा रुद्र
सेवानिवृत्त सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल।
अब जीवन को शांत गति से जी रहे हैं।
लेकिन दोस्तों के बीच आते ही…
फिर वही पुरानी शरारती मुस्कान लौट आई।

सुरेश माथुर
निर्माता, निर्यातक और टर्नकी प्रोजेक्ट कॉन्ट्रैक्टर।
आज भी कहते हैं —
“अभी नए अवसरों की तलाश में हूँ…”
और शायद दोस्ती से बड़ा अवसर जीवन में कोई होता भी नहीं।

विनय अग्रवाल
व्यवसाय की दुनिया में सफल नाम।
लेकिन इस मुलाकात में किसी ने बिज़नेस की बात नहीं की।
सब सिर्फ एक-दूसरे की आँखों में पुराना समय ढूँढ रहे थे।

अरुण माथुर
राजस्थान सरकार में अपर निदेशक, अभियोजन के पद से सेवानिवृत्त।
कानून और जिम्मेदारियों के लंबे सफर के बाद भी, दोस्तों के बीच आते ही वो फिर वही बेफिक्र साथी बन गये।

मनमोहन गुप्ता
बैंक ऑफ बड़ौदा से मुख्य महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त।
आज राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) में सदस्य न्यायाधीश के रूप में इंदौर पीठ में कार्यरत हैं।
लेकिन उस दिन कोई “जज” नहीं था…
सब सिर्फ दोस्त थे।

डॉ. सुधीन्द्र सक्सेना
ENT विभाग में प्रधान विशेषज्ञ रहे।
राजस्थान सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त।
लोगों की आवाज़ें ठीक करने वाले डॉक्टर…
उस दिन खुद पुराने दोस्तों की आवाज़ सुनकर भावुक हो उठे।

कैलाश बैरवा, I.A.S. (Retd.)
प्रशासनिक सेवा में लंबे और सम्मानजनक अनुभव के साथ कार्य कर चुके कैलाश बैरवा ने अपने कार्यकाल में जिम्मेदारी, अनुशासन और संवेदनशील नेतृत्व की मिसाल पेश की।
एक वरिष्ठ IAS अधिकारी के रूप में उन्होंने शासन और प्रशासन के अनेक महत्वपूर्ण दायित्व निभाए।
लेकिन इस री-यूनियन में उनकी पहचान किसी अधिकारी की नहीं, बल्कि उसी पुराने दोस्त की थी…
जो वर्षों बाद अपने साथियों के बीच बैठकर फिर से वही पुरानी हँसी, वही यादें और वही अपनापन महसूस कर रहा था।
दोस्तों के बीच आते ही पद और पहचान पीछे छूट गये…
और सामने था सिर्फ एक मुस्कुराता हुआ चेहरा, जो 50 साल पुरानी दोस्ती को फिर से जी रहा था।

कैलाश बैरवा, I.A.S. (सेवानिवृत्त)
राजस्थान प्रशासनिक सेवा और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में लंबे एवं प्रतिष्ठित कार्यकाल के दौरान कैलाश बैरवा ने अनेक महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन किया। अपने शांत स्वभाव, सुलझे हुए नेतृत्व और जनसरोकारों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण के लिए वे सदैव सम्मानित रहे हैं।
लेकिन इस री-यूनियन में उनकी पहचान किसी वरिष्ठ अधिकारी की नहीं, बल्कि उसी पुराने दोस्त की थी जो बचपन में अपने मित्रों के साथ घंटों कंचे (गोटी) खेला करता था। विशेष रूप से वे अपने मित्र “मिथुन” के साथ बिताए उन दिनों को आज भी बड़े प्रेम से याद करते हैं और आज भी उन्हें उसी नाम से पुकारते हैं।
कैलाश बैरवा स्वयं कहते हैं कि खेल उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। बचपन में कंचों से शुरू हुआ यह खेल प्रेम उम्र के साथ बदलता गया, लेकिन कभी समाप्त नहीं हुआ। आज भी वे ईश्वर और मित्रों के आशीर्वाद से नियमित रूप से टेनिस खेलते हैं और खेल भावना को जीवन का महत्वपूर्ण आधार मानते हैं।
उनके लिए यह री-यूनियन केवल दोस्तों से मिलने का अवसर नहीं था, बल्कि बचपन के उन सुनहरे पलों में फिर से लौटने जैसा था, जहाँ न कोई पद था, न कोई पहचान—सिर्फ दोस्ती, खेल और जीवन का आनंद था।

नरेश शर्मा
राजस्थान सरकार में सामाजिक अध्ययन विषय के वरिष्ठ शिक्षक के रूप में लंबे समय तक सेवाएँ देने के बाद नरेश शर्मा सेवानिवृत्त जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उन्होंने अपने अध्यापन काल में हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा देने के साथ-साथ समाज, इतिहास और नागरिक मूल्यों की समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
शिक्षक के रूप में उनका व्यक्तित्व हमेशा प्रेरणादायक रहा। आज भी वे शिक्षा, सामाजिक सरोकारों और पुराने मित्रों के साथ जुड़े रहने में विशेष रुचि रखते हैं। इस री-यूनियन ने उनके लिए उन दिनों की यादें ताज़ा कर दीं, जब जीवन में जिम्मेदारियों से अधिक सपने और दोस्तियाँ हुआ करती थीं।

उपेंद्र पांडे
राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन लिमिटेड, जयपुर से सेवानिवृत्त उपेंद्र पांडे ने अपने कार्यकाल में सहकारिता और डेयरी क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपनी सादगी, विनम्रता और मित्रवत स्वभाव के कारण वे हमेशा अपने साथियों के बीच लोकप्रिय रहे।
सेवानिवृत्ति के बाद वे परिवार, सामाजिक गतिविधियों और पुराने मित्रों के साथ समय बिताने का आनंद ले रहे हैं। वर्षों बाद जब पुराने साथियों का संपर्क हुआ, तो उनके लिए यह किसी खोई हुई पूँजी को फिर से पाने जैसा अनुभव था।

रवींद्र गंग
महालेखाकार कार्यालय से वरिष्ठ लेखा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त रवींद्र गंग उन लोगों में से हैं जो मानते हैं कि सेवानिवृत्ति काम से होती है, जीवन से नहीं। लंबे प्रशासनिक और वित्तीय अनुभव के बावजूद उनके व्यक्तित्व में आज भी वही उत्साह और ऊर्जा दिखाई देती है।
वे अक्सर मुस्कुराते हुए कहते हैं कि वे “सेवानिवृत्त तो हैं, लेकिन थके नहीं हैं।” आज वे परिवार, मित्रों और जीवन के छोटे-छोटे सुखों का भरपूर आनंद ले रहे हैं। इस पुनर्मिलन ने उनके भीतर छिपे उस युवा मित्र को फिर से जगा दिया, जो कभी अपने दोस्तों के साथ भविष्य के सपने देखा करता था।

प्रमोद माहेश्वरी
प्रमोद माहेश्वरी एक सफल उद्यमी हैं, जिन्होंने अपने परिश्रम, दूरदर्शिता और सकारात्मक सोच के बल पर व्यवसाय जगत में अपनी अलग पहचान बनाई है।
व्यावसायिक व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने हमेशा रिश्तों और मित्रताओं को महत्व दिया। उनके लिए यह री-यूनियन केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उन लोगों से दोबारा जुड़ने का अवसर था, जिन्होंने उनके जीवन के सबसे निश्छल और खूबसूरत वर्षों को साझा किया था।

वीरेंद्र खंडेलवाल
बैंक ऑफ बड़ौदा, मुंबई में महाप्रबंधक के प्रतिष्ठित पद पर कार्य करने के बाद वीरेंद्र खंडेलवाल ने वर्ष 2022 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) का विकल्प चुना। वर्तमान में वे मुंबई के एक बैंक में आंतरिक लोकपाल (Internal Ombudsman) के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में उनके दशकों के अनुभव ने उन्हें एक कुशल प्रशासक और उत्कृष्ट मार्गदर्शक के रूप में स्थापित किया है। जिम्मेदारियों से भरे लंबे करियर के बावजूद उन्होंने मित्रताओं की गर्माहट को कभी कम नहीं होने दिया।
जब वर्षों बाद पुराने मित्रों से मुलाकात हुई, तो पद, प्रतिष्ठा और उपलब्धियाँ सब पीछे छूट गईं। उस पल वे फिर वही पुराने साथी थे, जो कभी भविष्य के सपने देखते थे और जीवन को पूरे उत्साह से जीने की बातें किया करते थे। उनकी मुस्कान में आज भी वही आत्मीयता और अपनापन झलकता है, जिसने मित्रताओं को पाँच दशकों तक जीवित रखा।
सोशल मीडिया से पहले वाली दोस्ती… शायद ज्यादा सच्ची थी
आज दोस्ती “ऑनलाइन” दिखाई देती है।
लेकिन उस दौर में दोस्ती “दिल” में रहती थी।
ना DP…
ना स्टेटस…
ना Seen…
ना Last Seen…
फिर भी रिश्ता इतना मजबूत कि आधी सदी बाद भी एक आवाज़ सब कुछ वापस ले आई।

वो सिर्फ री-यूनियन नहीं थी… वो समय यात्रा थी
जब ये सारे दोस्त एक साथ बैठे, तो वहाँ सिर्फ लोग नहीं थे…
वहाँ स्कूल की घंटियाँ थीं…
क्लासरूम की हँसी थी…
कैंटीन की आवाज़ें थीं…
वो अधूरी शरारतें थीं…
वो सपने थे जिन्हें कभी सबने मिलकर देखा था।
किसी ने धीरे से कहा —
“यार… हम बूढ़े हो गये…”
और सामने से जवाब आया —
“लेकिन हमारी दोस्ती नहीं।”
कुछ पल के लिये सब शांत हो गये।
क्योंकि उस एक वाक्य में पूरी जिंदगी छुपी हुई थी।
दोस्ती रिश्तों से अलग क्यों होती है?

क्योंकि दोस्ती में कोई भूमिका नहीं निभानी पड़ती।
ना कोई औपचारिकता…
ना कोई अपेक्षा…
ना कोई दिखावा…
दोस्त वही होता है जिसके सामने आप फिर से 18 साल के हो जाते हैं।
शायद जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई… दोस्त ही होते हैं
आज हर किसी के पास पैसा है…
पद है…
परिवार है…
सम्मान है…
लेकिन इस री-यूनियन ने एक बात फिर साबित कर दी —
“जिंदगी में सबसे अमीर वो नहीं… जिसके पास सबसे ज्यादा दौलत है।
सबसे अमीर वो है… जिसके पास 50 साल पुराने दोस्त आज भी मौजूद हैं।”
और जयपुर की इस कहानी ने बता दिया…
समय बदल सकता है।
चेहरे बदल सकते हैं।
शहर बदल सकते हैं।
लेकिन अगर दोस्ती सच्ची हो…
तो 50 साल बाद भी सिर्फ एक कॉल काफी होता है।
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क्योंकि आखिर में…
दोस्ती — दोस्ती ही होती है।
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