भोपाल/बालाघाट:
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आज प्रदेश के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ते हुए ‘जंगली भैंस’ पुनर्स्थापना परियोजना का शुभारंभ किया। बालाघाट जिले के सूपखार क्षेत्र स्थित कान्हा टाइगर रिजर्व में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने 4 जंगली भैंसों—3 मादा और 1 नर—को उनके नए प्राकृतिक आवास में छोड़ा। ये भैंसे काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से विशेष रूप से लाए गए हैं।

100 साल बाद वापसी, जैव-विविधता को मिलेगा नया जीवन

प्रदेश में जंगली भैंसों की आबादी लगभग एक सदी पहले समाप्त हो गई थी। अब इस ऐतिहासिक पहल के जरिए उनकी वापसी सुनिश्चित की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रदेश की जैव-विविधता और वन पारिस्थितिकी तंत्र को नई मजबूती मिलेगी।

50 भैंसों का लक्ष्य, वैज्ञानिक तरीके से होगा संरक्षण

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत कुल 50 जंगली भैंसों को ‘फाउंडर पॉपुलेशन’ के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। पहले चरण में 8 भैंसों का ट्रांसलोकेशन किया जाएगा। पूरी प्रक्रिया वरिष्ठ वन अधिकारियों और पशु-चिकित्सकों की निगरानी में वैज्ञानिक तरीके से संपन्न की जा रही है।

MP-असम के बीच वन्यजीव सहयोग का नया अध्याय

यह परियोजना मध्यप्रदेश और असम के बीच वन्यजीव संरक्षण सहयोग का एक नया मॉडल भी प्रस्तुत कर रही है। समझौते के तहत असम से गैंडे भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान लाए जाएंगे, जबकि मध्यप्रदेश असम को बाघ और मगरमच्छ उपलब्ध कराएगा।

CM डॉ. मोहन यादव की दूरदर्शी पहल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि चीता पुनर्स्थापना की सफलता के बाद अब जंगली भैंसों की वापसी से प्रदेश की जैव-विविधता को नया आयाम मिलेगा। उन्होंने इसे आने वाले समय में देश के लिए एक मॉडल परियोजना बताया।

भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के अध्ययन में कान्हा टाइगर रिजर्व को जंगली भैंसों के पुनर्स्थापन के लिए सबसे उपयुक्त पाया गया है। यहां की विस्तृत घासभूमि, पर्याप्त जल स्रोत और कम मानव हस्तक्षेप इस प्रजाति के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं।

मध्यप्रदेश पहले ही ‘टाइगर स्टेट’ और ‘लेपर्ड स्टेट’ के रूप में देश में अपनी पहचान बना चुका है। जंगली भैंसों की पुनर्स्थापना से यह गौरव और सुदृढ़ होगा।

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